प्रार्थना से संस्कार, लेकिन बच्चों की सुरक्षा भी जरूरी: स्कूलों में शेड निर्माण की मांग हुई तेज..छत्तीसगढ़ के शासकीय विद्यालयों में नई प्रार्थना व्यवस्था लागू करने की तैयारी, शिक्षाविदों और अभिभावकों ने उठाया आधारभूत सुविधाओं का मुद्दा।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ के शासकीय स्कूलों में विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास, नैतिक शिक्षा और सांस्कृतिक मूल्यों के संवर्धन को ध्यान में रखते हुए प्रार्थना सभा की नई व्यवस्था लागू किए जाने की चर्चा के बीच एक महत्वपूर्ण सवाल भी सामने आने लगा है। जहां एक ओर सुबह की प्रार्थना सभा में राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, दीप मंत्र, सरस्वती वंदना, गुरु मंत्र तथा महापुरुषों की जीवनी के वाचन जैसे कार्यक्रम शामिल किए जाने की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी ओर अभिभावकों, शिक्षकों और सामाजिक संगठनों ने विद्यालय परिसरों में पर्याप्त आकार के स्थायी शेड निर्माण की आवश्यकता पर जोर दिया है।प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार सुबह विद्यालय लगने पर राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, दीप मंत्र, सरस्वती वंदना, गुरु मंत्र और महापुरुषों के जीवन प्रसंगों का वाचन कराया जाएगा। मध्यान्ह भोजन के समय भोजन मंत्र तथा विद्यालय की छुट्टी के समय राज्यगीत, गायत्री मंत्र और शांति मंत्र का सामूहिक पाठ होगा। शिक्षा से जुड़े जानकारों का मानना है कि इससे विद्यार्थियों में अनुशासन, नैतिकता, राष्ट्रभक्ति और सांस्कृतिक चेतना का विकास होगा।हालांकि इस व्यवस्था के क्रियान्वयन को लेकर एक व्यावहारिक पक्ष भी सामने आया है। प्रदेश के अधिकांश प्राथमिक, माध्यमिक, हाई और हायर सेकेंडरी विद्यालयों में आज भी पर्याप्त प्रार्थना मंच या बड़े शेड की सुविधा उपलब्ध नहीं है। गर्मी के मौसम में तेज धूप तथा वर्षाकाल में लगातार बारिश के बीच विद्यार्थियों को 15 से 20 मिनट तक खुले मैदान में खड़ा रहना पड़ता है। इससे छोटे बच्चों को शारीरिक असुविधा, थकान और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।शिक्षाधिकारियों का कहना है कि प्रार्थना सभा केवल औपचारिक कार्यक्रम नहीं बल्कि विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण का महत्वपूर्ण माध्यम है। इसलिए इसके लिए ऐसा वातावरण भी उपलब्ध कराया जाना चाहिए जहां बच्चे सहज, सुरक्षित और सुविधाजनक तरीके से भाग ले सकें। यदि विद्यालयों में बड़े आकार के शेड, बैठने की व्यवस्था तथा साउंड सिस्टम जैसी आधारभूत सुविधाएं विकसित की जाएं तो प्रार्थना सभा अधिक प्रभावी और व्यवस्थित बन सकती है।ग्रामीण क्षेत्रों के कई विद्यालयों में स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है। बरसात के दिनों में मैदान कीचड़युक्त हो जाते हैं, जबकि गर्मी में तापमान 40 डिग्री से ऊपर पहुंच जाता है। ऐसे में विद्यार्थियों और शिक्षकों दोनों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। कई अभिभावकों का कहना है कि सांस्कृतिक एवं नैतिक शिक्षा से जुड़े कार्यक्रमों का वे स्वागत करते हैं, लेकिन बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना भी उतना ही आवश्यक है।सामाजिक संगठनों और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों ने राज्य सरकार से मांग की है कि नई प्रार्थना व्यवस्था लागू करने के साथ-साथ प्रदेश के सभी शासकीय विद्यालयों में चरणबद्ध तरीके से स्थायी शेड निर्माण, पेयजल व्यवस्था, पंखों और अन्य आवश्यक सुविधाओं के लिए विशेष बजट का प्रावधान किया जाए। उनका मानना है कि जब तक आधारभूत संरचना मजबूत नहीं होगी, तब तक किसी भी नई व्यवस्था का अपेक्षित लाभ पूरी तरह नहीं मिल पाएगा।शिक्षकों के अनुसार यदि सरकार प्रार्थना सभा को संस्कार, अनुशासन और राष्ट्रीय चेतना का माध्यम बनाना चाहती है तो इसके साथ विद्यालयों की भौतिक सुविधाओं के उन्नयन पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा। शिक्षा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों को सुरक्षित, सम्मानजनक और सुविधायुक्त वातावरण उपलब्ध कराना भी शासन और प्रशासन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।छत्तीसगढ़ में प्रस्तावित नई प्रार्थना व्यवस्था को लेकर सकारात्मक माहौल दिखाई दे रहा है, लेकिन इसके साथ उठी शेड निर्माण की मांग यह संकेत दे रही है कि अब शिक्षा व्यवस्था में केवल पाठ्यक्रम या गतिविधियों ही नहीं, बल्कि विद्यार्थियों की सुविधा और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को भी समान महत्व दिए जाने की आवश्यकता है। यही संतुलन भविष्य की गुणवत्तापूर्ण और संवेदनशील शिक्षा व्यवस्था की पहचान बन सकता है।


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