तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ के वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग इन दिनों गंभीर आरोपों के घेरे में है। दावा किया जा रहा है कि विभाग में चल रहे कथित घोटालों को लेकर “सर्वव्यापी” अखबार द्वारा लगातार सप्रमाण खबरें प्रकाशित की जा रही थीं, जिससे वन विभाग के उच्च अधिकारियों में बौखलाहट की स्थिति पैदा हो गई है।इसी कथित बौखलाहट के चलते नवा रायपुर स्थित वन मुख्यालय में “सर्वव्यापी” अखबार के वितरण पर रोक लगाए जाने की बात सामने आ रही है। मुख्यालय में पदस्थ संदीप तिवारी का कहना है कि यह निर्णय प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) व्ही. निवासन राव के निर्देश पर लिया गया है।इस घटनाक्रम ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि वास्तव में अखबार द्वारा प्रकाशित खबरें तथ्यात्मक और सप्रमाण हैं, तो उन पर कार्रवाई करने के बजाय अखबार के वितरण को ही रोक देना कहीं न कहीं पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। वहीं, यदि खबरें भ्रामक हैं, तो विभाग को आधिकारिक रूप से उनका खंडन करना चाहिए था।मामले को लेकर विभाग की ओर से अब तक कोई स्पष्ट और लिखित स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है, जिससे संदेह और गहरा गया है। कर्मचारियों और जानकारों के बीच यह चर्चा तेज है कि क्या यह कदम सूचना को दबाने की कोशिश है।मीडिया विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया की भूमिका निगरानी और जवाबदेही तय करने की होती है। ऐसे में यदि किसी समाचार पत्र को केवल इसलिए प्रतिबंधित किया जाता है कि वह विभागीय अनियमितताओं को उजागर कर रहा है, तो यह न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता पर भी गंभीर चोट है।अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग इस पूरे मामले में क्या रुख अपनाता है—क्या आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी या फिर यह मामला भी दबा दिया जाएगा। वहीं इस संबंध में हमने पीसीसीएफ व्ही निवासन राव को उनके वाट्सएप में मैसेज कर इस संबंध में जानकारी चाहा था लेकिन खबर लिखे जाने तक हमें कोई जवाब नहीं मिल सका।