तरुण कौशिक, संपादक,सर्वव्यापी
देशभर में इन दिनों पर्यावरण संरक्षण के नाम पर बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अभियान चलाए जा रहे हैं। सरकारी विभाग, जनप्रतिनिधि, सामाजिक संगठन और राजनीतिक दल लाखों पौधे लगाने के दावे कर रहे हैं। हर वर्ष मानसून आते ही नेताओं और अधिकारियों की पौधा लगाते हुए तस्वीरें अखबारों और सोशल मीडिया की सुर्खियां बनती हैं। लेकिन एक बड़ा सवाल आज भी अनुत्तरित है कि जिन पौधों को बड़े उत्साह के साथ लगाया गया था, उनमें से कितने आज जीवित हैं?वर्तमान समय में वृक्षारोपण एक पर्यावरणीय अभियान कम और फोटो सेशन का माध्यम अधिक बनता जा रहा है। पौधा रोपने के बाद उसकी देखभाल, सुरक्षा और संरक्षण की जिम्मेदारी कौन निभा रहा है, इसका जवाब शायद ही किसी के पास हो। लाखों रुपये खर्च कर पौधे लगाए जाते हैं, लेकिन कुछ महीनों बाद अधिकांश पौधे सूख जाते हैं और उनकी जगह केवल सरकारी रिकॉर्ड और तस्वीरें ही बचती हैं।हाल के वर्षों में “मां के नाम एक पेड़” जैसे भावनात्मक अभियानों को भी व्यापक प्रचार मिला। लोगों ने अपनी माताओं के सम्मान में पौधे लगाए, नेताओं ने मंचों से भावुक भाषण दिए और सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा कीं। लेकिन यदि वास्तव में मां के प्रति सम्मान और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी है तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि पिछले वर्ष मां के नाम पर लगाए गए पौधे आज कितने बड़े हुए? कितने जीवित हैं? और उनकी देखरेख किसने की?पर्यावरण प्रेमियों का मानना है कि केवल पौधा लगाना ही पर्याप्त नहीं है। असली सफलता तब है जब वह पौधा वृक्ष बने और आने वाली पीढ़ियों को छाया, ऑक्सीजन और पर्यावरणीय सुरक्षा प्रदान करे। यदि पौधा कुछ ही महीनों में नष्ट हो जाए तो पूरा अभियान केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है।इसी संदर्भ में एक महत्वपूर्ण सुझाव सामने आ रहा है कि सरकार और सामाजिक संगठनों को हर वर्ष “वृक्ष प्रगति फोटोग्राफी प्रतियोगिता” आयोजित करनी चाहिए। इस प्रतियोगिता में नेताओं, अधिकारियों और संस्थाओं को पिछले वर्ष लगाए गए पौधों की वर्तमान स्थिति की तस्वीरें प्रस्तुत करनी चाहिए। इससे यह स्पष्ट होगा कि किसने केवल पौधा लगाया और किसने उसे वृक्ष बनने तक संरक्षित रखा।विशेषज्ञों का कहना है कि वृक्षारोपण पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। पौधों की खरीद, परिवहन, गड्ढा खुदाई, सुरक्षा व्यवस्था और प्रचार-प्रसार पर सरकारी खजाने से बड़ी राशि खर्च की जाती है। यदि लगाए गए पौधों का सत्यापन नहीं होगा तो यह आशंका बनी रहेगी कि कहीं पर्यावरण संरक्षण के नाम पर सरकारी धन का दुरुपयोग तो नहीं हो रहा। कई बार आंकड़ों में लाखों पौधे दिखाए जाते हैं, जबकि जमीन पर उनकी वास्तविक संख्या और स्थिति कुछ और ही होती है।जनता अब केवल पौधारोपण के आंकड़े नहीं, बल्कि परिणाम देखना चाहती है। लोगों का मानना है कि हर जनप्रतिनिधि और अधिकारी को अपने द्वारा लगाए गए पौधों का वार्षिक प्रतिवेदन सार्वजनिक करना चाहिए। इससे जवाबदेही बढ़ेगी और वृक्षारोपण अभियान वास्तव में पर्यावरण संरक्षण का माध्यम बन सकेगा।आज आवश्यकता इस बात की है कि पौधा लगाने वालों की तस्वीरों से अधिक महत्व उन वृक्षों की तस्वीरों को दिया जाए जो वर्षों बाद भी जीवित हैं। क्योंकि पर्यावरण की रक्षा कैमरे के फ्लैश से नहीं, बल्कि पौधों की निरंतर देखभाल से होती है।जब तक लगाए गए पौधों की जीवितता दर सार्वजनिक नहीं होगी, तब तक यह सवाल उठता रहेगा कि आखिर बढ़ कौन रहा है—पेड़ या फिर केवल तस्वीरें?