पद की प्रतिष्ठा या जनता से दूरी? प्रशासनिक संवेदनशीलता पर बहस।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) को देश की सबसे प्रतिष्ठित और जिम्मेदार सेवाओं में गिना जाता है। इन अधिकारियों के हाथों में शासन-प्रशासन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां होती हैं। जनता की समस्याओं का समाधान, योजनाओं का क्रियान्वयन और सरकार की नीतियों को धरातल तक पहुंचाना इन्हीं के दायित्वों में शामिल है। लेकिन समय-समय पर यह सवाल भी उठता रहा है कि क्या कुछ अफसर अपने पद और अधिकार के प्रभाव में जनता, जनप्रतिनिधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों से संवाद की बुनियादी मर्यादा को भूलते जा रहे हैं?वर्तमान दौर डिजिटल संचार का है। मोबाइल फोन, व्हाट्सएप, ई-मेल और सोशल मीडिया के माध्यम से संवाद पहले से कहीं अधिक सरल हुआ है। ऐसे में जब किसी अधिकारी को किसी महत्वपूर्ण सार्वजनिक मुद्दे, जनसमस्या या सूचना के संबंध में संदेश भेजा जाता है और उसका जवाब तक नहीं मिलता, तब स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न खड़ा होता है कि आखिर यह दूरी क्यों?प्रशासनिक व्यवस्था में यह तर्क दिया जाता है कि अधिकारियों पर काम का अत्यधिक दबाव रहता है। प्रतिदिन सैकड़ों फाइलें, बैठकें, दौरे और सरकारी दायित्वों के बीच हर संदेश का जवाब देना संभव नहीं होता। यह तर्क अपनी जगह उचित भी माना जा सकता है। लेकिन दूसरी ओर यह भी सच है कि किसी संदेश का संक्षिप्त उत्तर, प्राप्ति की पुष्टि या संबंधित अधिकारी को निर्देशित कर देना भी प्रशासनिक संवेदनशीलता का हिस्सा है।कई बार पत्रकारों और सामाजिक संगठनों का आरोप रहता है कि कुछ अधिकारी फोन उठाना या संदेशों का जवाब देना अपनी प्रतिष्ठा के विरुद्ध समझते हैं। इससे प्रशासन और समाज के बीच संवादहीनता की स्थिति बनती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवाद का अभाव अविश्वास को जन्म देता है, जबकि पारदर्शिता और संवाद से प्रशासन की विश्वसनीयता बढ़ती है।विशेषज्ञों का मानना है कि एक अच्छा प्रशासक केवल आदेश देने वाला अधिकारी नहीं होता, बल्कि वह जनता की बात सुनने वाला संवेदनशील व्यक्तित्व भी होता है। देश में अनेक ऐसे आईएएस अधिकारी रहे हैं जिन्होंने अपनी सरलता, उपलब्धता और जनसंपर्क के कारण जनता के बीच विशेष पहचान बनाई। उनकी कार्यशैली ने यह साबित किया कि बड़े पद पर रहते हुए भी विनम्र और जवाबदेह बना जा सकता है।वहीं यह भी आवश्यक है कि अधिकारियों को भेजे जाने वाले संदेश मर्यादित, तथ्यपूर्ण और जनहित से जुड़े हों। अनावश्यक, व्यक्तिगत या बार-बार किए जाने वाले संपर्क भी प्रशासनिक कार्यों में बाधा बन सकते हैं। इसलिए संवाद की जिम्मेदारी दोनों पक्षों पर समान रूप से लागू होती है।असल सवाल किसी एक अधिकारी या किसी एक राज्य का नहीं है। सवाल प्रशासनिक संस्कृति का है। क्या सरकारी व्यवस्था में जवाबदेही और जनसंपर्क को और अधिक मजबूत बनाने की आवश्यकता है? क्या अधिकारियों के लिए जनता और मीडिया के प्रति संवाद का न्यूनतम मानक तय होना चाहिए? ये ऐसे प्रश्न हैं जिन पर गंभीर विमर्श की जरूरत है।लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि मानी जाती है। प्रशासनिक पद सम्मान का विषय अवश्य है, लेकिन उस सम्मान की वास्तविक शक्ति जनता के विश्वास से ही आती है। इसलिए पद का प्रभाव तभी सार्थक है जब उसके साथ संवेदनशीलता, विनम्रता और संवाद की संस्कृति भी जुड़ी हो। यदि जनता और प्रशासन के बीच संवाद का पुल मजबूत होगा, तभी सुशासन की अवधारणा वास्तविक अर्थों में सफल मानी जाएगी।


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