तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

कोरबा जिले के शिक्षा विभाग में एक बार फिर पदस्थापना और प्रभार व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं। मामला विकासखंड पाली में बीआरसीसी (ब्लॉक रिसोर्स कोऑर्डिनेटर सेंटर) के प्रभार से जुड़ा है, जहां मुख्यमंत्री सचिवालय के निर्देशों के बावजूद कथित तौर पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने से प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।जानकारी के अनुसार, कोरबा जिले के निवासी एवं प्रदेश के वाणिज्य, उद्योग तथा श्रम मंत्री लखन लाल देवांगन ने लगभग दो वर्ष पूर्व मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर सहायक शिक्षक एवं वर्तमान में साक्षरता मिशन से जुड़े सत्यनारायण मनहर को बीआरसीसी पोड़ी-उपरोड़ा अथवा कोरबा शहरी क्षेत्र में पदस्थ किए जाने का अनुरोध किया था। मंत्री के पत्र को मुख्यमंत्री सचिवालय ने गंभीरता से लेते हुए जिला स्तरीय विषय होने के कारण संबंधित जिला प्रशासन को आवश्यक कार्रवाई हेतु अग्रेषित किया था।सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री सचिवालय से प्राप्त निर्देशों के बाद भी अपेक्षित निर्णय नहीं हो सका। उस समय संबंधित अधिकारियों द्वारा यह तर्क दिया गया कि संबंधित पद रिक्त नहीं हैं, इसलिए नियुक्ति अथवा पदस्थापना संभव नहीं है। हालांकि अब विभाग के भीतर से यह चर्चा सामने आ रही है कि कुछ स्थानों पर पद रिक्त होने के बावजूद आदेशों के अनुरूप कार्रवाई नहीं की गई।शिक्षा विभाग से जुड़े सूत्रों का दावा है कि विकासखंड पाली में बीआरसीसी का पद रिक्त होने के बावजूद एक सीएसी (क्लस्टर अकादमिक समन्वयक) को अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया गया है। विभाग के कुछ अधिकारियों का कहना है कि उक्त व्यवस्था प्रशासनिक आवश्यकता से अधिक व्यक्तिगत समीकरणों का परिणाम प्रतीत होती है। आरोप यह भी है कि अतिरिक्त प्रभार प्राप्त अधिकारी वर्तमान जिला शिक्षा अधिकारी के करीबी माने जाते हैं, जिसके कारण व्यवस्था में परिवर्तन नहीं किया जा रहा है।मामले को लेकर यह भी चर्चा है कि यदि जिला प्रशासन चाहे तो रिक्त पदों पर नियमित व्यवस्था बनाते हुए लंबे समय से लंबित प्रकरण का समाधान किया जा सकता है। शिक्षा विभाग के जानकारों का कहना है कि केवल पाली ही नहीं, बल्कि करतला विकासखंड में भी बीआरसीसी का पद रिक्त बताया जा रहा है, जहां प्रशासनिक निर्णय लेकर नियुक्ति की जा सकती है।इस पूरे मामले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि मुख्यमंत्री सचिवालय द्वारा भेजे गए निर्देशों का पालन नहीं हुआ, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? यदि पद रिक्त नहीं थे तो फिर अतिरिक्त प्रभार की व्यवस्था कैसे की गई? और यदि अब पद रिक्त हैं, तो मंत्री के पत्र और मुख्यमंत्री सचिवालय के निर्देशों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है?जिले में यह चर्चा भी तेज है कि वर्तमान कलेक्टर कुणाल दुदावत यदि इस मामले की समीक्षा करें तो लंबे समय से लंबित इस प्रकरण का समाधान निकल सकता है। प्रशासनिक हलकों में माना जा रहा है कि कलेक्टर स्तर पर वस्तुस्थिति की जांच होने पर यह स्पष्ट हो सकेगा कि आखिर मुख्यमंत्री सचिवालय के निर्देशों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई और रिक्त पदों पर प्रभार व्यवस्था किन परिस्थितियों में बनाई गई।फिलहाल यह मामला शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली, प्रशासनिक पारदर्शिता और शासन के निर्देशों के अनुपालन को लेकर बहस का विषय बन गया है। अब निगाहें जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों पर टिकी हैं कि वे इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं और क्या मुख्यमंत्री सचिवालय के निर्देशों के अनुरूप कोई ठोस निर्णय सामने आता है।