तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों कांग्रेस पार्टी की रणनीति पर सवाल खड़े हो रहे हैं। सत्ता से बाहर हो चुकी कांग्रेस जहां सरकार को घेरने के लिए रोज नए मोर्चे खोल रही है, वहीं उसकी सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह स्थानीय सरोकारों की बजाय राष्ट्रीय मुद्दों को तूल देने में ज्यादा समय और ऊर्जा खर्च कर रही है।छत्तीसगढ़ कांग्रेस लगातार ईडी, ईओडब्ल्यू की कार्रवाई और केंद्र सरकार की कथित दमनकारी नीतियों पर आवाज उठा रही है। “वोट चोर गद्दी छोड़” जैसे नारों से सत्ता पक्ष पर हमला बोला जा रहा है, लेकिन ये मुद्दे आम जनता से सीधे तौर पर नहीं जुड़ पा रहे हैं। नतीजा यह कि कांग्रेस का हमला धारहीन साबित हो रहा है।बिजली बिल, महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की फसल खरीदी, राशन कार्ड से जुड़ी दिक्कतें और स्थानीय भ्रष्टाचार है और यही वे विषय हैं जिनसे छत्तीसगढ़ का मतदाता रोजाना दो-चार होता है। लेकिन कांग्रेस इन विषयों पर ठोस और ज़मीनी आंदोलन खड़ा करने से बचती दिख रही है। यही कारण है कि सरकार पर उसके हमले जनता तक असर नहीं छोड़ पा रहे।राजनीति के जानकारों का मानना है कि कांग्रेस की यह रणनीति आत्मघाती साबित हो सकती है। प्रदेश में विपक्ष के तौर पर कांग्रेस को जनता की आवाज बनना था, लेकिन वह दिल्ली की राजनीति के एजेंडे को यहां लागू करने में उलझ गई है। परिणाम यह कि जनता उसे गंभीर विकल्प की तरह नहीं देख पा रही।कांग्रेस यदि वास्तव में जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है तो उसे “राष्ट्रीय मुद्दों की प्रतिध्वनि” बनने की बजाय “स्थानीय सरोकारों की आवाज़” बनना होगा। बिजली बिल से लेकर किसानों की समस्याओं तक, बेरोजगारी से लेकर महिला सुरक्षा तक यही वे विषय हैं जो उसे राजनीतिक जमीन दोबारा दिला सकते हैं।छत्तीसगढ़ कांग्रेस इस समय भटकी हुई दिशा में बढ़ रही है। अगर उसने अपनी रणनीति नहीं बदली तो आने वाले समय में न केवल सत्ता से दूर रह जाएगी बल्कि विपक्ष की विश्वसनीय ताकत के रूप में भी अपनी पहचान खो देगी। जनता को राष्ट्रीय नहीं बल्कि स्थानीय राहत चाहिए और राजनीति में वही सफल होता है, जो जनता की नब्ज पकड़ ले।