वन मंडलाधिकारी के खिलाफ साज़िश से उजागर विभागीय अंतर्विरोध।

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तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/

बिलासपुर संभाग अंतर्गत एवं प्रथम मुख्यमंत्री दिवंगत अजीत जोगी के गृह जिला गौरेला–पेंड्रा–मरवाही जिले की वन मंडलाधिकारी ग्रीष्मी चांद (भारतीय वन सेवा, 2020 बैच) ने सिर्फ 8 महीने के अपने अल्प कार्यकाल में वन विभाग को पारदर्शिता, अनुशासन और जवाबदेही की दिशा में आगे बढ़ाने का साहसिक प्रयास किया है। अवैध कटाई, अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के विरुद्ध सख्त कार्रवाई कर उन्होंने यह स्पष्ट संदेश दिया कि कानून से ऊपर कोई नहीं है,चाहे वह भीतर का तंत्र ही क्यों न हो।विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, भारतीय वन सेवा 2020 बैच की वन अफसर ग्रीष्मी चांद को अपने कार्यभार के दौरान पूर्व पदस्थ कुछ वन मंडलाधिकारी के समय की कथित अनियमितताओं और संदिग्ध निर्णयों की “सफाई” करनी पड़ी। फाइलों की जांच, प्रक्रियाओं का सुधार और जवाबदेही तय करने की यह पहल कुछ प्रभावशाली राज्य स्तरीय विभागीय अधिकारियों को रास नहीं आई। नतीजतन, उनके विरुद्ध बेवजह, निराधार और मिथ्या शिकायतें गढ़े जाने की बातें सामने आ रही हैं।यह स्थिति न केवल एक ईमानदार अधिकारी की छवि को धूमिल करने का प्रयास प्रतीत होती है, बल्कि विभाग की प्रतिष्ठा को भी कठघरे में खड़ा करती है। जिस अधिकारी ने नियमों के पालन और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने का जोखिम उठाया, उसी को दबाव में लाने की कोशिशें प्रशासनिक नैतिकता पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।भारतीय वन सेवा की अफसर ग्रीष्मी चांद का अब तक का सेवा रिकॉर्ड स्पष्ट करता है कि वे निर्णयों में निष्पक्ष, कार्य में दृढ़ और आचरण में बेदाग रही हैं। वन संरक्षण, फील्ड अनुशासन, और जनहित से जुड़े मामलों में उनकी सक्रियता ने विभागीय कार्यसंस्कृति को नई दिशा दी है। ऐसे में उनके खिलाफ की जा रही शिकायतों का वस्तुनिष्ठ, पारदर्शी और समयबद्ध परीक्षण होना आवश्यक है, ताकि सत्य सामने आए और अफवाहों पर विराम लगे।आज आवश्यकता इस बात की है कि शासन-प्रशासन ईमानदार अधिकारियों के साथ दृढ़ता से खड़ा हो। यदि भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई करने वालों को ही निशाना बनाया जाएगा, तो यह संदेश जाएगा कि व्यवस्था ईमानदारी को दंडित और अनियमितताओं को संरक्षण देती है,जो किसी भी सुदृढ़ प्रशासन के लिए घातक है।अंततः, ग्रीष्मी चांद जैसी युवा, कर्मठ और निष्पक्ष आईएफएस अधिकारियों का मनोबल बढ़ाना ही राज्य के वन प्रबंधन और सुशासन के हित में है। सत्य की कसौटी पर खरे उतरने वाले अधिकारियों को संरक्षण और समर्थन मिलना चाहिए, ताकि विभाग अपनी गरिमा और जनता का विश्वास बनाए रख सके।


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