कबीरधाम /धनंजय चेतन साहू/ ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ की पहचान उसकी भाषा और संस्कृति से होती है, लेकिन राज्य की मूल भाषा छत्तीसगढ़ी आज भी सरकारी उदासीनता का दंश झेल रही है। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा दिया, पर 25 वर्ष बीत जाने के बावजूद यह दर्जा व्यवहारिक पहचान में तब्दील नहीं हो पाया।वर्तमान विष्णु देव साय सरकार का नारा “हमने बनाया है, हम ही संवारेंगे” छत्तीसगढ़ी भाषा के मामले में अब सवालों के घेरे में है। सरकार के दो वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग में आज तक अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति नहीं हो सकी। यह पद कांग्रेस शासनकाल से ही रिक्त हैं, और नई सरकार भी इस दिशा में कोई ठोस पहल करती नहीं दिख रही।राजभाषा आयोग से संबंधित विभाग के मंत्री राजेश अग्रवाल की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। आयोग जैसे संवेदनशील विषय पर न कोई सार्वजनिक वक्तव्य, न कोई पहल सामने आई है। इससे यह संदेश जा रहा है कि सरकार छत्तीसगढ़ी भाषा को प्राथमिकता की सूची में स्थान ही नहीं दे रही।विभागीय सूत्रों का कहना है मुख्यमंत्री सचिवालय में मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह वर्तमान में निगम, मंडल, आयोग और बोर्डों के कामकाज की निगरानी कर रहे हैं। ऐसे में बड़ा प्रश्न यह है कि क्या वे छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग की नियुक्ति को लेकर मुख्यमंत्री से तत्काल चर्चा करेंगे, या यह आयोग भी अन्य उपेक्षित संस्थाओं की तरह फाइलों में ही सिमटा रहेगा।गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग में अब तक नियुक्तियां राजनीतिक दलों से ऊपर उठकर होती रही हैं। राजपत्र में भी स्पष्ट प्रावधान है कि छत्तीसगढ़ी भाषा के जानकार, साहित्यकार और पत्रकार को ही अध्यक्ष व सदस्य बनाया जाना चाहिए। इसके बावजूद पत्रकारिता जगत से आज तक किसी योग्य व्यक्ति को अवसर नहीं मिल सका।पूर्ववर्ती रमन सिंह सरकार के समय उम्रदराज तीन पंडितों को अध्यक्ष बनाया गया, जिसमें सर्वप्रथम दिवंगत श्याम लाल चतुर्वेदी, द्वितीय दानेश्वर शर्मा और तृतीय विनय पाठक शामिल हैं । लेकिन युवा, सक्रिय और जमीनी स्तर पर भाषा के लिए संघर्ष कर रहे चेहरों को लगातार नजरअंदाज किया गया। आज आवश्यकता है कि युवा नेतृत्व को आयोग की कमान सौंपी जाए, ताकि छत्तीसगढ़ी भाषा को सिर्फ मंचों तक नहीं, बल्कि शिक्षा, प्रशासन और रोजगार से जोड़ा जा सके।वहीं छत्तीसगढ़ राज्य रजत जयंती वर्ष मना रहा है, लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इसी ऐतिहासिक अवसर पर छत्तीसगढ़ी भाषा अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रही है। यदि सरकार अब भी नहीं जागी, तो आने वाली पीढ़ियां यही सवाल करेंगी कि राजभाषा होने के बावजूद छत्तीसगढ़ी को न्याय क्यों नहीं मिला।अब समय आ गया है कि विष्णु देव साय सरकार तत्काल निर्णय ले,राजभाषा आयोग में अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति करे, युवा, साहित्यकार और पत्रकारों को प्रतिनिधित्व दे, और छत्तीसगढ़ी भाषा को घोषणाओं से निकालकर जमीन पर उतारे। क्योंकि भाषा बचेगी तभी पहचान बचेगी, और पहचान बचेगी तभी छत्तीसगढ़ मजबूत बनेगा।