तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की विष्णु देव साय सरकार को दो वर्ष पूरे हो चुके हैं। सरकार ने इन दो वर्षों में कई अहम फैसले लिए, योजनाओं को आगे बढ़ाया और प्रशासनिक स्तर पर स्थिरता का संदेश देने की कोशिश की, लेकिन सत्तारूढ़ दल के भीतर ही एक ऐसा गंभीर मुद्दा है जो अब चर्चा के गलियारों में लगातार गूंजने लगा है।विधायकों को अब तक संसदीय सचिव की जिम्मेदारी नहीं मिल पाना, पार्टी के भीतर असंतोष की सबसे बड़ी वजह बनता जा रहा है। बताया जा रहा है कि कई विधायक लंबे समय से इस अपेक्षा में हैं कि उन्हें सरकार में कोई न कोई जिम्मेदारी सौंपी जाएगी, जिससे वे अपने क्षेत्र की समस्याओं को सीधे शासन स्तर पर प्रभावी ढंग से रख सकें।हालांकि, यह रोष अभी खुलकर सामने नहीं आया है। भीतर ही भीतर असंतोष पनप रहा है, लेकिन न तो कोई विधायक सार्वजनिक रूप से मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, उप मुख्यमंत्रीगण और न ही भाजपा संगठन के शीर्ष पदाधिकारियों के समक्ष इस मुद्दे को खुलकर रखने का साहस कर पा रहे हैं। पार्टी अनुशासन और संगठनात्मक मर्यादा के कारण अधिकांश विधायक चुप्पी साधे हुए हैं।राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि लंबे समय तक यह स्थिति बनी रही, तो इसका असर न केवल विधायकों के मनोबल पर पड़ेगा, बल्कि संगठनात्मक समन्वय पर भी प्रश्नचिह्न लग सकता है। विधायकों की सक्रियता और जिम्मेदारी तय होना सरकार और संगठन, दोनों के लिए आवश्यक माना जाता है।अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले समय में भाजपा नेतृत्व इस अंदरूनी असंतोष को किस तरह संभालता है और क्या विधायकों की अपेक्षाओं को ध्यान में रखते हुए संसदीय सचिवों की नियुक्ति पर कोई ठोस निर्णय लिया जाता है या नहीं।