तरुण कौशिक /संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ में महिला आरक्षण अब सशक्तिकरण नहीं, बल्कि परिवार प्रबंधन योजना बनता जा रहा है। मतदाता महिला को चुनते हैं, शपथ महिला लेती है, तस्वीर महिला की लगती है, लेकिन सत्ता की फाइलें खोलने–बंद करने की चाबी उनके पति, पुत्र, देवर या “घर के अनुभवी रणनीतिकार” संभालते हैं। इसे ही शायद नए दौर की लोकतांत्रिक नवाचार नीति कहा जा रहा है नाम महिला का, काम पुरुष का।पंचायत हो या नगर निगम, दृश्य एक जैसा है। बैठक में कुर्सी पर महिला जनप्रतिनिधि, पीछे से कान में फुसफुसाते अनौपचारिक अध्यक्ष। कहीं पति जी दिशा-निर्देश दे रहे हैं, कहीं पुत्र जी विकास का खाका समझा रहे हैं। महिला प्रतिनिधि का काम अक्सर “हां में हां” मिलाना और फोटो सत्र में मुस्कुराना भर रह गया है।संविधान और कानून साफ कहते हैं कि निर्वाचित महिला की जगह कोई रिश्तेदार शासन नहीं चलाएगा। मगर जमीनी हकीकत में यह नियम उसी फाइल में बंद है, जिसमें कार्रवाई के आदेश वर्षों से धूल फांक रहे हैं। शिकायतें आती हैं, जांचें बैठती हैं और नतीजा वही औपचारिकता पूरी, व्यवस्था जारी।सबसे रोचक भूमिका निभा रहा है प्रशासन। सब जानते हैं, सब देखते हैं, पर कार्रवाई के वक्त अचानक आंखों पर नियमों की पट्टी बंध जाती है। सवाल उठता है—क्या यह ‘पति–पुत्र राज’ प्रशासनिक कृपा के बिना पनप सकता है? या फिर महिला सशक्तिकरण सिर्फ पोस्टर और भाषणों तक सीमित कर दिया गया है?करोड़ों रुपये के प्रचार, सेमिनार और योजनाओं के बावजूद महिला जनप्रतिनिधि खुद को बेबस महसूस कर रही हैं। जिनके हाथ में निर्णय होने चाहिए, वे निर्णय सुन रही हैं। आरक्षण का मकसद था नेतृत्व गढ़ना, लेकिन यहां तो घर का मुखिया ही सर्वेसर्वा बना बैठा है।क्या शासन–प्रशासन कभी इस लोकतांत्रिक व्यंग्य को गंभीरता से लेगा? या फिर महिला आरक्षण यूं ही काग़ज़ों में मुस्कुराता रहेगा और ज़मीनी हकीकत में पति–पुत्र राज व्यवस्था को खोखला करता रहेगा?लोकतंत्र मंच पर है, पटकथा घर से लिखी जा रही है और तालियां नियमों की चुप्पी बजा रही हैं।