तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ की राजनीति इन दिनों गहरे मंथन के दौर से गुजर रही है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय सहित कुछ मंत्रियों को हटाए जाने की चर्चाएं सत्ता के गलियारों से लेकर प्रशासनिक महकमे तक गर्म हैं। विशेषकर विवादों में रहे मंत्रियों को हटाने की मांग जोर पकड़ रही है, वहीं यह सवाल भी उभरकर सामने आ रहा है कि यदि मुख्यमंत्री को हटाया जाता है, तो क्या इसकी असली वजह मंत्रियों से अधिक मुख्यमंत्री सचिवालय की कार्यप्रणाली होगी?राजनीतिज्ञों का मानना है कि मुख्यमंत्री को हटाने का अर्थ केवल राजनीतिक निर्णय नहीं होगा, बल्कि यह मुख्यमंत्री सचिवालय के जिम्मेदार अफसरों की भूमिका पर भी सीधा प्रश्नचिह्न होगा। क्योंकि सरकार की नीतियों का क्रियान्वयन, जनशिकायतों का निराकरण और प्रशासनिक अनुशासन सबकी धुरी मुख्यमंत्री सचिवालय ही होता है।इस पूरे परिदृश्य में मुख्यमंत्री सचिवालय के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह और सचिव पी. दयानंद की भूमिका निर्णायक मानी जा रही है। प्रशासनिक हलकों में इन दोनों अफसरों की कार्यप्रणाली को लेकर संतोष का माहौल है। कहा जा रहा है कि फाइलों की गति, विभागीय समन्वय और निर्णय प्रक्रिया में इनकी सक्रियता ही वह मजबूत आधार है, जिसके दम पर मुख्यमंत्री की कुर्सी फिलहाल सुरक्षित दिखाई दे रही है।हालांकि, केवल सचिवालय स्तर पर संतोष पर्याप्त नहीं है। जमीनी हकीकत यह है कि मंत्रालय से लेकर जनपद पंचायत स्तर तक कई अधिकारी अपेक्षित कसावट नहीं दिखा पा रहे हैं। योजनाओं में ढिलाई, जवाबदेही की कमी और जनसमस्याओं के प्रति उदासीनता ने सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया है। यही कारण है कि राजनीतिक असंतोष का दबाव अब प्रशासनिक सुधार की मांग में तब्दील हो रहा है।साफ है कि आने वाला समय केवल मंत्रियों के भविष्य का फैसला नहीं करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि प्रशासनिक ढांचे में किस स्तर तक सख्ती लाई जाती है। यदि मुख्यमंत्री सचिवालय अपनी प्रभावी भूमिका बनाए रखता है और निचले स्तर के अधिकारियों पर कसावट लाने में सफल होता है, तो सरकार राजनीतिक तूफानों से उबर सकती है।