कुर्मी समाज को प्रतिनिधित्व तो मिला, पर सवालों के घेरे में ‘चयन’ की राजनीति वरिष्ठों की अनदेखी, युवा चेहरों की उपेक्षा और संगठन के भीतर असंतोष।

Share Now

के.एस.ठाकुर/ कार्यकारी संपादक सर्वव्यापी

बिलासपुर जिले में कुर्मी समाज को हाल के वर्षों में राजनीति और संगठनात्मक स्तर पर उल्लेखनीय प्रतिनिधित्व मिला है। यह पहली बार है जब किसी निगम, मंडल, आयोग, बोर्ड या मंडी में कुर्मी समाज को अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंच मिली है। भाजपा संगठन में भी कुर्मी समाज का दबदबा साफ दिखाई दे रहा है। कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए संतोष कौशिक ‘गुरु जी’ को जिला भाजपा उपाध्यक्ष बनाया गया, तखतपुर जनपद पंचायत के पूर्व उपाध्यक्ष प्रदीप कौशिक को जिला भाजपा महामंत्री की जिम्मेदारी मिली, वहीं बिल्हा विधायक धरमलाल कौशिक के पुत्र को जिला भाजपा मंत्री बनाया गया। जिला से लेकर प्रदेश स्तर तक कुर्मी समाज को स्थान मिला है, यह अपने आप में बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।लेकिन इसी उपलब्धि के बीच एक बड़ा सवाल भी उभर कर सामने आ रहा है—क्या यह प्रतिनिधित्व संतुलित और न्यायसंगत है?राजनीतिक और संगठनात्मक अनुभव रखने वाले कई वरिष्ठ कुर्मी नेता आज खुद को दरकिनार महसूस कर रहे हैं। पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष घनश्याम कौशिक, पूर्व जिला पंचायत सदस्य अशोक कौशिक, भाजपा संगठन में बेहतर चुनावी परिणाम दिलाने वाले कृष्ण कुमार कौशिक, को-ऑपरेटिव बैंक के पूर्व अध्यक्ष ज्योतिष कश्यप, पूर्व जिला पंचायत सदस्य नरेश कौशिक जैसे नाम ऐसे हैं, जिन्हें आज भी किसी बड़ी जिम्मेदारी का इंतजार है। वर्षों का अनुभव, संगठन के लिए काम और जमीनी पकड़ होने के बावजूद इन नेताओं की उपेक्षा ने समाज के भीतर असंतोष को जन्म दिया है।सबसे अधिक चर्चा उस युवा कुर्मी साहित्यकार को लेकर है, जो पिछले 15 वर्षों से एक आयोग में अध्यक्ष पद की नियुक्ति के लिए संघर्ष कर रहा है। भाजपा और आरएसएस का सक्रिय सदस्य और पदाधिकारी होने के बावजूद उसे लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि समाज के कुछ वरिष्ठ नेता ही नहीं चाहते कि यह युवा चेहरा आगे आए। इसी अंदरूनी विरोध ने कुर्मी समाज के भीतर ‘पीढ़ी संघर्ष’ की तस्वीर भी साफ कर दी है।अब सवाल सीधा है—क्या भाजपा की विष्णु देव साय सरकार बिलासपुर के कुर्मी समाज के इस युवा चेहरे को बड़ी जिम्मेदारी देगी?या फिर संगठन और सत्ता के गलियारों में वही चेहरे आगे बढ़ेंगे, जिनके नाम पहले से तय माने जा चुके हैं?कुर्मी समाज के भीतर उठ रही यह चर्चा अब केवल सामाजिक विमर्श नहीं रही, बल्कि राजनीतिक संदेश भी बन चुकी है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा नेतृत्व अनुभव और युवाओं के बीच संतुलन बनाता है या फिर उपेक्षा की यह कहानी और लंबी होती है।


Share Now

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You cannot copy content of this page

error: Content is protected !!