युवा नेतृत्व या पुरानी जड़ता? छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग और सूचना आयोग की नियुक्तियों पर साय सरकार के फैसले की घड़ी।

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तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ़ में लंबे समय से खाली पड़े छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग और छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग को लेकर अब निर्णायक माहौल बनता दिख रहा है। विष्णु देव साय सरकार के सामने न केवल इन आयोगों में नियुक्ति की जिम्मेदारी है, बल्कि यह तय करने की भी चुनौती है कि नियुक्तियां भविष्य की सोच के साथ हों या बीते ढर्रे पर।राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि इस बार छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग की कमान किसी युवा चेहरे को सौंपी जानी चाहिए। भाजपा के केंद्रीय संगठन और स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लगातार युवाओं को बड़ी जिम्मेदारियां दिए जाने के उदाहरण सामने हैं। ऐसे में राज्य स्तर पर भी यदि युवा नेतृत्व को अवसर मिलता है, तो यह संदेश जाएगा कि छत्तीसगढ़ सरकार नई सोच और नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ रही है।दूसरी ओर, छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग को लेकर यह संकेत मिल रहे हैं कि कैबिनेट बैठक के बाद पूर्व मुख्य सचिव अमिताभ जैन को मुख्य सूचना आयुक्त बनाए जाने पर तुरंत फैसला हो सकता है। यदि ऐसा होता है, तो यह आयोग के लिए एक मजबूत और अनुभवी नेतृत्व माना जाएगा, जिससे वर्षों से लंबित मामलों के निपटारे में गति आने की उम्मीद है।गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग पिछले करीब सात वर्षों से पूरी तरह निष्क्रिय स्थिति में है। कांग्रेस सरकार के कार्यकाल से लेकर अब तक न तो अध्यक्ष की नियुक्ति हो सकी और न ही सदस्यों की। इस कारण छत्तीसगढ़ी भाषा के संवर्धन, प्रचार और सरकारी कामकाज में उसके प्रभावी क्रियान्वयन का उद्देश्य अधूरा पड़ा है।प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह की भूमिका इस पूरे मसले में बेहद अहम मानी जा रही है। उन्हें ही मुख्यमंत्री को यह समझाने और निर्णय के लिए राजी करने की आवश्यकता है कि भले ही राजभाषा आयोग को ‘मलाईदार आयोग’ न माना जाए, लेकिन यह आयोग छत्तीसगढ़ी भाषा और सांस्कृतिक पहचान को सशक्त करने के लिए बनाया गया है। इसकी अनदेखी राज्य की अस्मिता की अनदेखी के समान है।अब सवाल यही है कि क्या विष्णु देव साय सरकार राजभाषा आयोग में युवा नेतृत्व को आगे लाकर नई परंपरा की शुरुआत करेगी और सूचना आयोग में अनुभवी हाथों को जिम्मेदारी सौंपकर पारदर्शिता को मजबूत करेगी? या फिर ये दोनों आयोग आगे भी फैसलों के इंतजार में खाली ही पड़े रहेंगे।राज्य की जनता और बौद्धिक वर्ग की निगाहें अब सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं।


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