क्या ‘कलेक्ट्री दिमाग’ मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय सरकार की नैया ले डूबेगा..?

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तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय सरकार को बने दो साल पूरे होने को हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि अब तक न तो संसदीय सचिवों की नियुक्ति हो सकी है और न ही शेष बचे निगम-मंडल, आयोग-बोर्ड और मुख्यमंत्री के सलाहकार पदों को भरा जा सका है। वर्तमान स्थिति यह है कि मुख्यमंत्री के साथ औपचारिक रूप से केवल एक ही चेहरा सक्रिय दिखता है—मीडिया सलाहकार के रूप में पंकज झा। इसके अलावा राजनीतिक और नीतिगत सलाह का दायरा लगभग शून्य नजर आता है।राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सरकार का यह ढीला ढांचा मुख्यमंत्री की साख पर सीधा असर डाल रहा है। सत्ता में आने के बाद जिस तेज निर्णय क्षमता और सुशासन की उम्मीद की जा रही थी, वह प्रशासनिक जटिलताओं और ‘कलेक्ट्री सोच’ में उलझकर रह गई है। आरोप यह भी लग रहे हैं कि फाइलों पर फैसले लेने की बजाय अफसरशाही सरकार की दिशा तय कर रही है, जिससे जनप्रतिनिधियों की भूमिका सीमित होती जा रही है।सरकार के भीतर असंतोष की सुगबुगाहट अब खुले तौर पर सुनाई देने लगी है। विधायक और संगठन से जुड़े नेता खुद को हाशिए पर महसूस कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि समय रहते संसदीय सचिवों, निगम-मंडल अध्यक्षों और आयोग-बोर्ड के पदों पर नियुक्तियाँ नहीं की गईं, तो न केवल संगठनात्मक संतुलन बिगड़ेगा, बल्कि सरकार की जमीनी पकड़ भी कमजोर पड़ेगी।भाजपाइयों की राय में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के लिए यह निर्णायक मोड़ है। यदि उन्हें अपनी साख और सरकार की स्थिरता बचानी है, तो प्रशासनिक फैसलों से ऊपर उठकर राजनीतिक संतुलन साधना होगा। अनुभवी नेताओं, विशेषज्ञ सलाहकारों और जनप्रतिनिधियों को जिम्मेदारी देकर ही सरकार की नैया को संभाला जा सकता है। अन्यथा आशंका जताई जा रही है कि ‘कलेक्ट्री दिमाग’ से चल रही यह व्यवस्था आने वाले समय में सरकार के लिए भारी पड़ सकती है।अब सवाल यह है—क्या मुख्यमंत्री समय रहते बड़ा राजनीतिक फैसला लेकर अपनी सरकार को मजबूती देंगे, या फिर खाली कुर्सियाँ और बढ़ती नाराजगी उनकी साख पर सवाल खड़े करती रहेंगी? छत्तीसगढ़ की राजनीति की नजरें इसी जवाब पर टिकी हैं।


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