नूर मोहम्मद,, ब्यूरोचीफ, सर्वव्यापी
मरवाही वन मंडल अंतर्गत मरवाही वन परिक्षेत्र में सामने आए इमारती लकड़ी तस्करी के गंभीर मामले ने पूरे वन विभाग को कटघरे में खड़ा कर दिया है। इस प्रकरण में परिक्षेत्र सहायक मरवाही एक पंडित जी, वनरक्षक राकेश पंकज (परिसर रक्षक, उषाढ़ एम) तथा परिक्षेत्र अधिकारी के शासकीय वाहन चालक तेज सिंह रजक पर संगठित गिरोह के रूप में वन माफियाओं से मिलकर हरे-भरे वनों की अवैध कटाई कर इमारती लकड़ी बेचने के आरोप लगे हैं।ग्रामीणों का आरोप है कि यदि समय रहते जागरूक ग्रामीण सामने नहीं आते, तो यह तस्करी पूरी तरह अंजाम तक पहुंच जाती। ग्रामीणों ने मौके से जुड़े तथ्यात्मक प्रमाण—इमारती लकड़ी के गोले, वनरक्षक की ब्रेजा कार की मौके पर मौजूदगी, शासकीय वाहनों के दुरुपयोग तथा रात्रि लगभग 2 बजे सरकारी वाहन चालक के खाते में फोन-पे के माध्यम से संदिग्ध राशि ट्रांसफर—को सोशल मीडिया पर वायरल किया और संबंधित अधिकारियों को विधिवत शिकायत भी सौंपी।घटना के सामने आने के बाद आम जनता को उम्मीद थी कि दोषी वनकर्मियों पर सख्त कार्रवाई होगी, लेकिन आरोप है कि इसके विपरीत मरवाही के डीएफओ ने पूरे मामले को दबाने और आरोपित कर्मचारियों को बचाने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। बताया जाता है कि वायरल वीडियो और साक्ष्यों के आधार पर एक प्रशिक्षु आईएफएस अधिकारी को जांच अधिकारी नियुक्त कर मात्र दो दिनों में जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत करने की तिथि निर्धारित की गई, वहीं दूसरी ओर डीएफओ स्वयं मरवाही पहुंचकर मामले को अपने स्तर पर “हैंडल” करने लगे।सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि मीडिया में यह बयान सामने आया कि “मामला वर्ष 2025 का है”, जबकि उपलब्ध साक्ष्य इस दावे से मेल नहीं खाते। जानकारों का कहना है कि इतना स्पष्ट प्रमाण होने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई न होना, न केवल विभागीय निष्पक्षता बल्कि एक आईएफएस अधिकारी जैसे उच्च पद की जिम्मेदारी पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।पर्यावरण प्रेमियों और जागरूक नागरिकों ने इस पूरे प्रकरण को गंभीर बताते हुए सीसीएफ बिलासपुर एवं छत्तीसगढ़ शासन से मांग की है किदोषी परिक्षेत्र सहायक, वनरक्षक और वाहन चालक के विरुद्ध पीओआर दर्ज कर तत्काल सेवा से बर्खास्त किया जाए,तथा मरवाही के डीएफओ पर पद के दुरुपयोग का प्रकरण दर्ज कर कड़ी विभागीय कार्रवाई की जाए।साथ ही चेतावनी दी गई है कि यदि समय रहते उच्च अधिकारी संज्ञान नहीं लेते, तो यह मामला जन आंदोलन का रूप ले सकता है।अब सवाल यह है कि—क्या मरवाही वन मंडल सचमुच जंगलराज की ओर बढ़ रहा है? यह सवाल आज केवल पत्रकार या पर्यावरण प्रेमी नहीं, बल्कि पूरे जीपीएम जिले की जनता पूछ रही है।