प्रोटोकॉल की खुली अवहेलना! केंद्रीय मंत्री के सरकारी आवास की फोटो-दीवार पर उठा संवैधानिक तूफान।

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तरुण कौशिक/संपादक, सर्वव्यापी

केंद्रीय राज्य मंत्री एवं बिलासपुर लोकसभा सांसद तोखन साहू एक बार फिर विवादों के केंद्र में हैं। इस बार मामला किसी बयान या योजना का नहीं, बल्कि भारत के संवैधानिक प्रोटोकॉल की कथित खुलेआम अनदेखी का है। बिलासपुर स्थित उनके सरकारी आवास की एक तस्वीर सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों से लेकर आमजन तक में तीखी चर्चा शुरू हो गई है।तस्वीर में दिखाई दे रहा फोटो-क्रम न केवल असामान्य है, बल्कि सीधे-सीधे भारत सरकार द्वारा निर्धारित प्रोटोकॉल नियमों के विपरीत बताया जा रहा है। फोटो-दीवार पर पहले क्रम में रमेन डेका का चित्र लगाया गया है, उसके बाद विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह, फिर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय का फोटो नजर आता है। इसके बाद चौथे क्रम में देश की प्रथम नागरिक द्रौपदी मुर्मू, पांचवें क्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, और छठवें क्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का फोटो लगाया गया है।यहीं से विवाद गहराता है। प्रोटोकॉल के जानकारों के अनुसार किसी भी सरकारी आवास, कार्यालय या सार्वजनिक स्थल पर फोटो-प्रदर्शन का स्पष्ट नियम है। सबसे पहले राष्ट्रपति, फिर प्रधानमंत्री, इसके बाद राज्यपाल, मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष का क्रम अनिवार्य होता है। लेकिन यहां इस व्यवस्था को उलट-पुलट कर प्रस्तुत किया गया है, जिससे संवैधानिक पदों की गरिमा पर सवाल खड़े हो रहे हैं।आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि केंद्रीय राज्य मंत्री होते हुए तोखन साहू ने जानबूझकर प्रोटोकॉल को दरकिनार किया और स्थानीय स्तर पर स्वयं को सर्वोच्च पंक्ति में दिखाने की राजनीतिक मानसिकता को बढ़ावा दिया। आलोचकों का कहना है कि यह केवल “दीवार की सजावट” का मामला नहीं, बल्कि संवैधानिक अनुशासन और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के प्रति सोच को दर्शाता है।स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों का सवाल है कि जब एक केंद्रीय मंत्री ही प्रोटोकॉल का पालन नहीं करेंगे, तो प्रशासनिक अमले और अधीनस्थ अधिकारियों से नियमों के सम्मान की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। कई लोगों ने इसे “संवैधानिक पदों का अपमान” तक करार दिया है।राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा तेज है कि क्या यह भूलवश हुई चूक है या फिर शक्ति-प्रदर्शन की सोची-समझी कोशिश। हालांकि अब तक इस पूरे मामले पर केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू की ओर से कोई आधिकारिक सफाई सामने नहीं आई है।फिलहाल यह तस्वीर एक बड़ा सवाल छोड़ जाती है, क्या सत्ता के शिखर पर बैठे जनप्रतिनिधि स्वयं नियमों को तोड़ेंगे, या संवैधानिक मर्यादाओं का सम्मान कर लोकतंत्र की गरिमा को मजबूत करेंगे? अब निगाहें प्रशासन और केंद्र सरकार पर टिकी हैं कि इस कथित प्रोटोकॉल उल्लंघन पर क्या कोई कार्रवाई या स्पष्टीकरण सामने आता है या नहीं।


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