तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी ग्रीन क्रेडिट योजना में बिलासपुर संभाग अंतर्गत गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के मरवाही वनमंडल में कथित तौर पर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई है। विश्वस्त सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार, वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत से योजना में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं और वित्तीय गड़बड़ियां सामने आई हैं।विभागीय सूत्र बताते हैं कि तत्कालीन डीएफओ द्वारा लगभग 500 हेक्टेयर क्षेत्र में प्लांटेशन का प्रस्ताव शासन को भेजा गया, जबकि यह क्षेत्र सिंचित प्लांटेशन के लिए उपयुक्त नहीं था। इसके बावजूद दबाव में उबड़-खाबड़, झाड़ीदार और विरल वन क्षेत्रों को भी प्लांटेशन योग्य बताकर स्वीकृति हासिल कर ली गई।योजना के तहत पौध तैयार करने में भी भारी गड़बड़ी की बात सामने आई है। केंद्रीय नर्सरी सदवानी, खोडरी, चिचगोहन, मरवाही और इन्द्रउद्यान रोपड़ी में पहले से मनरेगा के तहत तैयार पौधों को ही ग्रीन क्रेडिट योजना में दर्शाकर लगभग 3 लाख पौधों की तैयारी का फर्जी बिल बनाया गया। प्रति पौधा 60 रुपये के हिसाब से करोड़ों रुपये सामग्री और मजदूरी के नाम पर निकाल लिए गए। वहीं, टॉल प्लांट की जगह छोटे पौधे रोपे गए, जिनमें से वर्तमान में 30 प्रतिशत भी जीवित नहीं बताए जा रहे हैं।विश्वस्त सूत्रों के अनुसार, सामग्री खरीदी में भी बड़े स्तर पर खेल हुआ। जेम टेंडर प्रक्रिया के जरिए कथित तौर पर चहेती फर्मों को लाभ पहुंचाया गया और चैनलिंग पोल, जाली तार, आरसीसी पोल, बोर खनन व मोटर जैसी सामग्री निम्न गुणवत्ता की खरीदी गई। शिकायतें सामने आने के बाद संबंधित फर्मों को ब्लैकलिस्ट करने के आदेश भी जारी किए गए, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इन्हीं फर्मों को भुगतान भी कर दिया गया।सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब सामग्री घटिया थी, तो सत्यापन करने वाले अधिकारियों ने गुणवत्ता को सही कैसे ठहराया और भुगतान कैसे स्वीकृत किया? इससे पूरे मामले में कमीशनखोरी और मिलीभगत की आशंका और गहरी हो जाती है।विश्वस्त सूत्रों का दावा है कि इस पूरे मामले में करीब 50 करोड़ रुपये के संगठित घोटाले को अंजाम दिया गया है, जिसमें विभागीय अधिकारी, क्षेत्रीय अमला और कार्यालयीन कर्मचारी शामिल बताए जा रहे हैं।अब मांग उठ रही है कि इस गंभीर मामले की उच्च स्तरीय जांच समिति से निष्पक्ष जांच कराई जाए, ताकि सच्चाई सामने आ सके और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो। अन्यथा, जनता के पैसों की इस तरह बंदरबांट का सिलसिला यूं ही जारी रहने की आशंका बनी रहेगी।