तरुण कौशिक /संपादक सर्वव्यापी /
छत्तीसगढ़ नई बल्कि देस अऊ दूसर राज्य ल ओखर संस्कृति,भासा ,वेसभूसा ले जाने पहचाने जाथे अऊ एला हम सबों ल संजोग के रखे के आवश्यकता है,जेकर से हमर मान-सम्मान हर जगह बने रहय फेर आज के बदलते बेरा म हम न अपन संस्कृति, परंपरा ल भूलवात हन अऊ नवा युग ल अपना के अपन संस्कृति, परंपरा, रिती रिवाज ल भूलवात हन जेकर ले हमी ल बाद म अब्बड़ -अब्बड़ पीरा होही! हमर छत्तीसगढ के रिती रिवाज अऊ परंपरा म लईका होए के बाद छट्टी,बरही करे जाथे जऊन ल लईका के होए के बाद पांच, छः दिन म छट्टी करे जाथे ओकर बाद बारह- तेरह दिन बाद बरही मनाए जाथे, फेर आज छत्तीसगढ़ राज्य म ए सब ह सिरागे हे अऊ अब लईका होए के बाद छट्टी, बरही नई बल्कि एक साल बाद लईका के जन्म दिन मनाए जावत हे, जेन ल हमर सियान मन के कमजोरी के कारण आईसन देखे ल मिलत हे, हम छत्तीसगढ़िया मन आवाईया पीढ़ी ल अपन संस्कृति, परंपरा रिती रिवाज ल बताए अऊ दिखाए बर हमन ल छट्टी, बरही ल सियान मन द्वारा बनाए नियम के आधार म करना चाही, ऐकर संगे संग सबसे बड़े पीरा के गोठ बात आए के आज छत्तीसगढ़ म छत्तीसगढ़िया मन नई केवल लईका मन के छट्टी, बरही मन ल भूलागे हे बल्कि नहावन घलोक ल भूलागे हे जेन ल विधि विधान ले नई करे ल मरे हुए आदमी,औरत के आत्मा ल शांति नई मिल पावत हे अऊ मरे हुए आदमी औरत के आत्मा ह भटकत रहिथे ए हमन ल अपन सियान मन ले सुने ल मिलत हे, आज हमर छत्तीसगढ़िया मन मरे आदमी, औरत के अंतिम संस्कार लेके बड़ लापरवाही करत हे, नहावन के मतलब हे मरे आदमी, औरत के आत्मा शांति बर दस दिन ले रोज नदियां, तालाब म नहाए जाए बर पड़थे फेर आज सहरी करन के कारण लोगन मन तीन,पांच,सात दिन म नहावन के काम ल कर देवत हे, जब के हमर सियान मन नियम बनाए हवै के लईका मन मरत हे तव तीन, पांच,सात अऊ नौ दिन म उमर के हिसाब नहावन के काम ल करे जाथे अऊ बिहाव होए के बाद मरे आदमी, औरत के नहावन ल पूरा दस दिन म पूरा करे जाथे,फेर आज तीज – तिहार आथे तौ पांच,सात दिन म नहावन के काम ल करत हे अऊ नहावन ल सहर के लोगन मन तालाब,नदिया म नई बल्कि अपन घर- दूवार म नहावत हे, जबके नहावन म नहाए के मतलब नदियां, तालाब म ही पूरा करे के परंपरा हवै अऊ गांव देहात म ए सब ल नदी, तालाब म करे जात हे फेर पीरा के संग कहे ल पड़त हे के नहावन के दिन के गोठ बात दूर अंतिम संस्कार के दिन घलोक श्मशान घाट ले आए के बाद घलोक कई आदमी मन तालाब, नदियां म नई नहाए अऊ बिना नहाए आ जाथे, जेकर से ए कहना गलत नई होए के आज हम छत्तीसगढ़िया मन छट्टी, बरही अऊ नहावन ल सिर्फ़ औपचारिकता बना के छोड़ दें हन , जेकर कारण से आज छट्टी,बरही ल आज के पीढ़ी मन भूलागे हे अऊ आईसने स्थिति रहि तव लोगन मन अब नहावन घलोक ल नई कर ही,अऊ छत्तीसगढ़ के आवाईया पीढ़ी मन अपन संस्कृति, परंपरा, रिती रिवाज जेमा सबसे बड़े मरे आदमी, औरत के क्रियाक्रम,नहावन ल भूला जाही..! निश्चित रूप ले ए सब ल बचाए बर सबो समाज के पदाधिकारी मन ल आघू आके अपन समाज, छत्तीसगढ़ के संस्कृति, परंपरा, रिती रिवाज ल बचाए बर आना चाही अऊ छट्टी, बरही के संगे संग नहावन के काम बूता ल नियम कायदा ले करना चाही..!