तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग में अव्यवस्था और लापरवाही को लेकर अब सीधे तौर पर मंत्री गजेन्द्र यादव और सचिव सिद्धार्थ कोमल सिंह परदेशी पर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि विभागीय शिकायतों की समय-सीमा में जांच कराने को लेकर शीर्ष नेतृत्व पूरी तरह उदासीन बना हुआ है, जिसके कारण वर्षों से लंबित मामलों में पीड़ित कर्मचारियों को न्याय नहीं मिल पा रहा है।जानकारी के मुताबिक, कांग्रेस सरकार के समय से लंबित कई छोटी-बड़ी शिकायतें आज तक फाइलों में दबकर रह गई हैं। इन मामलों में न तो निष्पक्ष जांच पूरी हो पाई है और न ही दोषियों पर कार्रवाई हो सकी है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि मंत्री और सचिव स्तर पर इच्छाशक्ति की कमी के चलते पूरा सिस्टम सुस्त पड़ा हुआ है।सबसे गंभीर बात यह है कि राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत अपीलों का भी समय पर निराकरण नहीं हो पा रहा है। जिन मामलों में उच्च स्तर पर हस्तक्षेप की उम्मीद थी, वहां भी विभाग की निष्क्रियता साफ नजर आ रही है, जिससे पीड़ितों में निराशा और आक्रोश बढ़ता जा रहा है।इधर, आरोप यह भी लग रहे हैं कि विभाग शिकायतों के निराकरण के बजाय “चोरी-छुपे समन्वय” के जरिए स्थानांतरण प्रक्रिया में ज्यादा सक्रिय है। कर्मचारियों, व्याख्याताओं और शिक्षक एलबी वर्ग के तबादलों में पारदर्शिता की कमी और मनमानी के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं।वहीं सर्वव्यापी के पास ऐसे दस्तावेज हैं जो यह दर्शाते हैं कि जांच प्रक्रिया वर्षों से केवल औपचारिकता बनकर रह गई है। रमन सरकार से लेकर कांग्रेस शासन तक, जांच शुरू तो होती है लेकिन उसे पूरा करने की गंभीरता कभी नहीं दिखाई गई।पीड़ित कर्मचारियों का कहना है कि इस “जांच के खेल” ने उनकी उम्मीदों को पूरी तरह खत्म कर दिया है। कई लोग वर्षों से न्याय की आस लगाए बैठे हैं, लेकिन हर बार उन्हें केवल आश्वासन ही मिलता है।अब इस पूरे मामले में मुख्य सचिव विकासशील की भूमिका बेहद अहम मानी जा रही है। मांग उठ रही है कि वे सीधे हस्तक्षेप कर मंत्री और सचिव स्तर पर जवाबदेही तय करें और लंबित शिकायतों की समयबद्ध व निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करें।यदि जल्द ही सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यह मामला प्रशासनिक विफलता का बड़ा उदाहरण बन सकता है। फिलहाल, शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर उठते सवाल सीधे शीर्ष नेतृत्व की जवाबदेही तय कर रहे हैं।