तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
बिलासपुर संभाग की राजनीति और शिक्षा विभाग में इन दिनों एक ऐसे आदेश को लेकर चर्चा तेज हो गई है, जिसमें एक वर्तमान विधायक की शिक्षिका पत्नी को विधायक का “विशेष सहायक/निज सचिव” बनाए जाने का मामला सामने आया है। बताया जा रहा है कि इस संबंध में जिला शिक्षा विभाग द्वारा बाकायदा आदेश भी जारी किया गया था। आदेश सार्वजनिक होने के बाद अब इसकी वैधानिकता, प्रशासनिक औचित्य और सेवा नियमों को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं।विभागीय सूत्रों के अनुसार संबंधित शिक्षिका मूल रूप से शिक्षा विभाग में पदस्थ हैं, लेकिन उन्हें खुद के विधायक पति के विशेष सहायक,निज सचिव के रूप में कार्य करने की अनुमति दिए जाने संबंधी आदेश जारी किया गया था। मामला सामने आने के बाद शिक्षा विभाग और राजनीतिक गलियारों में इस पर चर्चा का दौर शुरू हो गया है। कई लोगों का सवाल है कि क्या किसी शासकीय शिक्षिका को नियमित शैक्षणिक दायित्वों से अलग कर किसी जनप्रतिनिधि के व्यक्तिगत या राजनीतिक कार्यालय में विशेष सहायक के रूप में नियुक्त किया जा सकता है?इस पूरे मामले में वर्तमान जिला शिक्षा अधिकारी ने स्वयं को विवाद से अलग करते हुए स्पष्ट किया है कि उक्त आदेश उनके कार्यकाल में जारी नहीं हुआ था। उनका कहना है कि यह आदेश पूर्व जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा जारी किया गया था और वर्तमान में विभाग उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर मामले का परीक्षण कर सकता है।हालांकि प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी शासकीय कर्मचारी की पदस्थापना, प्रतिनियुक्ति अथवा विशेष कार्य के लिए नियुक्ति शासन के निर्धारित सेवा नियमों और सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति के अधीन होती है। ऐसे में यदि किसी विधायक के लिए विशेष सहायक के रूप में किसी शिक्षिका की सेवाएं ली गई हैं तो यह देखना आवश्यक होगा कि इसके लिए सक्षम स्तर से अनुमति प्राप्त की गई थी या नहीं।शिक्षा विभाग से जुड़े कर्मचारियों का एक वर्ग भी इस मामले को लेकर सवाल उठा रहा है। उनका कहना है कि प्रदेश में अनेक विद्यालय शिक्षक-शिक्षिकाओं की कमी से जूझ रहे हैं। ऐसे समय में यदि शिक्षण कार्य से जुड़े कर्मचारियों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाया जाता है तो इसका सीधा असर विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ता है।राजनीतिज्ञों का कहना है कि मामला केवल एक आदेश का नहीं है, बल्कि प्रशासनिक निष्पक्षता और हितों के टकराव से भी जुड़ा हुआ है। विधायक की पत्नी स्वयं शासकीय कर्मचारी होने के साथ-साथ अपने ही विधायक पति की विशेष सहायक की भूमिका में कार्य करती हैं तो इससे निर्णय प्रक्रिया और प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर भी प्रश्न खड़े हो सकते हैं।उधर विभागीय सूत्रों का कहना है कि यदि आदेश नियमों के अनुरूप जारी किया गया है तो संबंधित दस्तावेज और स्वीकृतियां सार्वजनिक होनी चाहिए, वहीं यदि प्रक्रिया में किसी प्रकार की त्रुटि पाई जाती है तो विभाग को इसकी समीक्षा कर आवश्यक कार्रवाई करनी चाहिए।अब सभी की निगाहें शिक्षा विभाग और राज्य शासन पर टिकी हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मामले की औपचारिक जांच होती है या नहीं, तथा यह स्पष्ट किया जाता है कि विधायक की शिक्षिका पत्नी को खुद विधायक ने अपना विशेष सहायक निज सचिव बनाए जाने की प्रक्रिया किन नियमों और प्रावधानों के तहत पूरी की गई थी।फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है— क्या एक शासकीय शिक्षिका को विधायक का विशेष सहायक ,निज सचिव बनाना नियमसम्मत था, या फिर यह प्रशासनिक व्यवस्था के दायरे से बाहर का निर्णय था?