वाराणसी, प्रिया पाण्डेय, ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी
हाल ही में बिहार के मुख्यमंत्री द्वारा प्रधानमंत्री को लिखे गए पत्र और उसमें व्यक्त किए गए विचारों ने एक बार फिर “विकसित बिहार” की चर्चा को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बना दिया है। यह कहा गया कि बिहार विकसित भारत के सपने को नई ताकत दे रहा है। निस्संदेह, भारत के विकास में बिहार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। देश की बड़ी युवा आबादी, कृषि क्षमता, श्रमशक्ति और सांस्कृतिक विरासत बिहार को विशेष महत्व प्रदान करती है। किंतु किसी भी राज्य की वास्तविक प्रगति का आकलन केवल राजनीतिक वक्तव्यों या भावनात्मक अपीलों से नहीं, बल्कि विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विकास सूचकांकों, आर्थिक आंकड़ों तथा सामाजिक परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए।बिहार ने पिछले कुछ वर्षों में आर्थिक वृद्धि दर के मामले में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है। राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार बिहार की विकास दर कई अवसरों पर राष्ट्रीय औसत से अधिक दर्ज की गई है। यह निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत है। लेकिन केवल उच्च विकास दर किसी राज्य के समग्र विकास की गारंटी नहीं होती। विकास का वास्तविक अर्थ तब होता है जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और लोगों के जीवन स्तर में स्पष्ट सुधार दिखाई दे।आज भी बिहार प्रति व्यक्ति आय के मामले में देश के सबसे पीछे रहने वाले राज्यों में शामिल है। राष्ट्रीय औसत की तुलना में बिहार की प्रति व्यक्ति आय काफी कम है। इसका अर्थ यह है कि राज्य की अर्थव्यवस्था भले ही बढ़ रही हो, लेकिन आम नागरिक की आय और जीवन स्तर अपेक्षित गति से नहीं बढ़ पा रहा है। आर्थिक विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से पहुंचना अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।सतत विकास लक्ष्यों (Sustainable Development Goals-SDGs) के संदर्भ में भी बिहार की स्थिति गंभीर चिंतन की मांग करती है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित इन लक्ष्यों का उद्देश्य गरीबी उन्मूलन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, लैंगिक समानता, स्वच्छ जल एवं स्वच्छता, सम्मानजनक रोजगार तथा पर्यावरणीय संतुलन सुनिश्चित करना है। नीति आयोग द्वारा जारी विभिन्न रिपोर्टों में बिहार को अनेक सामाजिक विकास मानकों पर राष्ट्रीय औसत से पीछे पाया गया है। विशेष रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, गरीबी और रोजगार जैसे क्षेत्रों में राज्य को अभी लंबा सफर तय करना है।बहुआयामी गरीबी सूचकांक (Multidimensional Poverty Index) के आंकड़े भी चिंताजनक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। गरीबी केवल आय की कमी का नाम नहीं है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और जीवन की बुनियादी सुविधाओं से वंचित होना भी गरीबी का ही स्वरूप है। बिहार लंबे समय तक इस सूचकांक में देश के सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में शामिल रहा है। हालांकि हाल के वर्षों में कुछ सुधार दर्ज किए गए हैं, लेकिन स्थिति अभी भी संतोषजनक नहीं कही जा सकती।शिक्षा के क्षेत्र में भी बिहार अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। विद्यालयों में आधारभूत सुविधाओं की कमी, शिक्षकों की उपलब्धता, उच्च शिक्षा में सीमित अवसर और प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार सामने आने वाली अनियमितताएं युवाओं के भविष्य पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती हैं। लाखों छात्र बेहतर शिक्षा और रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। यदि किसी राज्य की युवा शक्ति अपने ही राज्य में अवसर न पा सके, तो विकास के दावे अधूरे प्रतीत होते हैं।स्वास्थ्य क्षेत्र की स्थिति भी व्यापक सुधार की मांग करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, डॉक्टरों की कमी, अस्पतालों का ढांचा और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सेवाओं तक पहुंच अभी भी बड़ी चुनौती है। कोरोना महामारी के दौरान देश ने देखा कि स्वास्थ्य व्यवस्था की मजबूती किसी भी राज्य के विकास का मूल आधार होती है।रोजगार का प्रश्न बिहार की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। बड़ी संख्या में बिहारी युवा रोजगार के लिए दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब और दक्षिण भारत के राज्यों की ओर जाते हैं। यह पलायन केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय समस्या भी है। यदि बिहार को वास्तव में विकसित राज्य बनना है तो उसे उद्योग, निवेश और रोजगार सृजन के क्षेत्र में बड़े कदम उठाने होंगे। केवल सरकारी नौकरियों पर निर्भर रहकर करोड़ों युवाओं की आकांक्षाओं को पूरा नहीं किया जा सकता।इसके बावजूद बिहार की संभावनाएं अत्यंत व्यापक हैं। कृषि, खाद्य प्रसंस्करण, पर्यटन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सूचना प्रौद्योगिकी और लघु उद्योगों के क्षेत्र में राज्य के पास अपार अवसर मौजूद हैं। आवश्यकता है कि नीतियों का केंद्र प्रचार और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बजाय मानव विकास, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं और रोजगार सृजन को बनाया जाए।विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब बिहार जैसे बड़े और महत्वपूर्ण राज्य वास्तविक अर्थों में विकसित होंगे। इसके लिए केवल भावनात्मक पत्र, राजनीतिक घोषणाएं और सरकारी विज्ञापन पर्याप्त नहीं हैं। विकास का वास्तविक पैमाना यह है कि आम नागरिक का जीवन कितना बेहतर हुआ, युवाओं को कितने अवसर मिले, किसानों की आय कितनी बढ़ी और गरीबों का जीवन कितना सम्मानजनक बना।बिहार के पास संसाधन हैं, प्रतिभा है, युवा शक्ति है और असीम संभावनाएं हैं। आवश्यकता केवल ऐसी विकास नीति की है जो आंकड़ों से आगे बढ़कर जनता के जीवन में परिवर्तन ला सके। तभी “विकसित बिहार” और “विकसित भारत” का सपना वास्तव में सार्थक सिद्ध होगा।