तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में शासकीय आवासों के आबंटन को लेकर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, जहां एक ओर विभिन्न विभागों में पदस्थ नियमित शासकीय कर्मचारी सरकारी आवास के अभाव में निजी मकानों में किराया देकर रहने को मजबूर हैं, वहीं दूसरी ओर ठेका प्रणाली, संविदा एवं दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को सरकारी आवास उपलब्ध कराए जाने की चर्चाएं प्रशासनिक गलियारों में तेजी से फैल रही हैं।सूत्रों का दावा है कि जिले में कई ऐसे नियमित अधिकारी एवं कर्मचारी हैं, जो वर्षों से शासकीय सेवा में कार्यरत होने के बावजूद आवास सुविधा से वंचित हैं। उन्हें हर माह अपनी जेब से हजारों रुपये खर्च कर किराए के मकानों में रहना पड़ रहा है। इससे न केवल उनकी आर्थिक स्थिति प्रभावित हो रही है, बल्कि शासन द्वारा नियमित कर्मचारियों को दी जाने वाली सुविधाओं के उद्देश्य पर भी प्रश्नचिह्न लग रहा है।मामले को और गंभीर बनाने वाली जानकारी यह सामने आ रही है कि परिवहन विभाग के क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी (आरटीओ) के लिए आरक्षित शासकीय आवास का आबंटन कथित रूप से एक अनियमित कर्मचारी को कर दिया गया है। यदि यह तथ्य सही पाया जाता है, तो यह शासकीय आवास आबंटन नियमों और प्राथमिकता निर्धारण प्रक्रिया पर बड़ा प्रश्न खड़ा कर सकता है। प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि किसी पद विशेष के लिए आरक्षित आवास का अन्य व्यक्ति को आवंटन केवल विशेष परिस्थितियों और निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही किया जा सकता है।जिले के कई कर्मचारियों का कहना है कि आवास आबंटन में पारदर्शिता का अभाव दिखाई देता है। उनका आरोप है कि पात्र कर्मचारियों की वरिष्ठता और आवश्यकता की अनदेखी कर कुछ मामलों में नियमों से हटकर निर्णय लिए जा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हो सकी है, लेकिन कर्मचारियों के बीच बढ़ती नाराजगी इस मुद्दे को गंभीर बना रही है।प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि शासकीय आवासों का मूल उद्देश्य उन अधिकारियों और कर्मचारियों को सुविधा उपलब्ध कराना है जो शासन की नियमित सेवाओं का निर्वहन कर रहे हैं। यदि वास्तव में नियमित कर्मचारियों को वंचित कर अन्य श्रेणी के कर्मियों को प्राथमिकता दी जा रही है, तो इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक हो जाती है। इससे न केवल व्यवस्था की पारदर्शिता सुनिश्चित होगी, बल्कि पात्र कर्मचारियों के हितों की भी रक्षा हो सकेगी।कर्मचारी संगठनों के बीच भी इस विषय को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। कई कर्मचारियों ने जिला प्रशासन से शासकीय आवासों की वर्तमान स्थिति, पात्रता सूची, रिक्त आवासों की संख्या तथा हाल के आबंटनों की जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से सामने लाई जाए तो विवाद की स्थिति स्वतः समाप्त हो सकती है।अब निगाहें जिला प्रशासन और संबंधित विभागों की प्रतिक्रिया पर टिकी हुई हैं। यदि आवास आबंटन में किसी प्रकार की अनियमितता हुई है तो उसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होना भी आवश्यक माना जा रहा है। वहीं यदि सभी आबंटन नियमों के अनुरूप किए गए हैं, तो प्रशासन को तथ्यात्मक जानकारी सार्वजनिक कर कर्मचारियों और आमजन के बीच व्याप्त भ्रम को दूर करना चाहिए।जिले में शासकीय आवासों के आबंटन को लेकर उठे ये सवाल आने वाले दिनों में एक बड़े प्रशासनिक मुद्दे का रूप ले सकते हैं। कर्मचारी वर्ग उम्मीद कर रहा है कि शासन और प्रशासन इस मामले में निष्पक्षता, पारदर्शिता और नियमसम्मत कार्रवाई सुनिश्चित करेंगे।