तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग को लेकर इन दिनों सत्ता और प्रशासनिक गलियारों में कई तरह की चर्चाएं तेज हो गई हैं। विभाग में पदस्थापन, स्थानांतरण और विभिन्न प्रशासनिक आदेशों को लेकर यह सवाल उठने लगा है कि क्या नियमों और शासन की अनुशंसाओं से अधिक प्रभावशाली लोगों की व्यक्तिगत पहुंच काम कर रही है? विभाग के भीतर से निकल रही सूचनाएं और प्रभावित पक्षों की शिकायतें इस बहस को और तेज कर रही हैं।बताया जा रहा है कि विभाग में कुछ ऐसे मामलों में त्वरित गति से आदेश जारी किए जा रहे हैं, जहां संबंधित व्यक्तियों की सीधी पहुंच प्रभावशाली स्तर तक है। वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री सचिवालय तथा मुख्य सचिव कार्यालय से भेजी गई अनुशंसा अथवा विचारार्थ प्रस्तुत फाइलों और पत्रों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने की शिकायतें सामने आ रही हैं। इससे प्रशासनिक कार्यप्रणाली की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़े हो रहे हैं।सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री सचिवालय के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह तथा मुख्य सचिव विकास शील के कार्यालय से विभिन्न मामलों में विभाग को भेजे गए पत्रों और अनुशंसाओं पर कई बार लंबे समय तक कार्रवाई नहीं होती। कुछ मामलों में तो संबंधित पक्षों को यह तक जानकारी नहीं मिल पाती कि उनकी फाइल किस स्तर पर लंबित है। इसके विपरीत, जिन लोगों की विभागीय या राजनीतिक स्तर पर मजबूत पकड़ बताई जाती है, उनके मामलों में अपेक्षाकृत शीघ्र निर्णय लिए जाने की चर्चा है।प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि यदि मुख्यमंत्री सचिवालय और मुख्य सचिव कार्यालय से प्राप्त पत्रों को भी गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है, तो यह शासन व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। राज्य की नौकरशाही में सामान्यतः मुख्यमंत्री सचिवालय और मुख्य सचिव कार्यालय को प्रशासनिक समन्वय का सर्वोच्च केंद्र माना जाता है। ऐसे में वहां से प्राप्त निर्देशों, सुझावों या अनुशंसाओं की अनदेखी शासन की मंशा और विभागीय कार्यशैली के बीच अंतर को दर्शाती है।विपक्षी दलों और कर्मचारी संगठनों के बीच भी इस मुद्दे को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। उनका कहना है कि यदि विभाग में निर्णयों का आधार केवल पहुंच और प्रभाव बनता जा रहा है, तो इससे योग्य और वास्तविक पात्र कर्मचारियों का मनोबल प्रभावित होगा। शासन द्वारा सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही की जो बात कही जाती है, उस पर भी प्रश्नचिह्न लग सकते हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि पूरे मामले की निष्पक्ष समीक्षा आवश्यक है। विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि मुख्यमंत्री सचिवालय और मुख्य सचिव कार्यालय से प्राप्त पत्रों पर कितनी कार्रवाई हुई, कितने मामले लंबित हैं और लंबित रहने के कारण क्या हैं। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी भी प्रशासनिक निर्णय में व्यक्तिगत पहुंच या प्रभाव के बजाय नियम, पात्रता और शासन की नीति को प्राथमिकता मिले।राज्य में सुशासन और प्रशासनिक कसावट को लेकर सरकार लगातार दावे कर रही है। ऐसे समय में स्कूल शिक्षा विभाग को लेकर उठ रहे ये सवाल केवल एक विभाग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे की विश्वसनीयता से जुड़े हुए हैं। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि शासन स्तर पर इन शिकायतों और चर्चाओं को किस गंभीरता से लिया जाता है तथा विभाग अपनी कार्यप्रणाली को लेकर क्या स्पष्टीकरण प्रस्तुत करता है।