तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ के मरवाही वनमंडल में पौधारोपण और पौधा तैयारी कार्यों में कथित वित्तीय अनियमितताओं का मामला अब एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। विधानसभा में उठे प्रश्न के बाद गठित जांच समिति की रिपोर्ट में कई गंभीर तथ्य सामने आने के बावजूद अब विभागीय गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि कहीं पूरे मामले को जांच के नाम पर औपचारिकता निभाकर ठंडे बस्ते में डालने की तैयारी तो नहीं की जा रही है।कार्यालय प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख, छत्तीसगढ़ द्वारा 3 जून 2026 को जारी पत्र में स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि जांच समिति का प्रतिवेदन प्राप्त हो चुका है तथा उसके आधार पर विभागीय टीप तैयार कर शासन को भेजी जानी है। यह मामला विधानसभा सदस्य शेषराज हरवंश द्वारा नियम 267 के तहत उठाए गए प्रश्न से जुड़ा हुआ है।जांच समिति की रिपोर्ट में सबसे गंभीर तथ्य यह सामने आया कि चिचगोहना रोपणी (मरवाही) और सधवानी रोपणी (खोड़री) में पौधा तैयारी से संबंधित अभिलेखों का व्यवस्थित संधारण नहीं किया गया। यही नहीं, वर्ष 2022-23 के बाद रोपणी प्रबंधन समिति के निष्क्रिय होने के बावजूद विभिन्न योजनाओं में पौधों के उपयोग और उपलब्धता को लेकर अनेक सवाल खड़े हुए हैं।रिपोर्ट के अनुसार रोपणियों में उपयोग की गई कई सामग्रियां—जैसे पॉलीथीन बैग, रेत, गोबर खाद, उपजाऊ मिट्टी, बोनमील और सागौन रूटशूट—कार्य आदेश जारी होने से पहले ही प्राप्त होना पाई गईं। यह तथ्य स्वयं में खरीद प्रक्रिया और वित्तीय नियमों के पालन पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।सबसे महत्वपूर्ण खुलासा तत्कालीन मुख्य वन संरक्षक बिलासपुर द्वारा भेजी गई शिकायतों की जांच में हुआ, जिसमें शिकायत क्रमांक 1, 2 और 3 को जांच समिति ने सत्य पाया है। समिति ने यह भी स्वीकार किया कि बड़ी संख्या में पौधे अन्य स्रोतों से प्राप्त किए गए।रिपोर्ट के अनुसार कैम्पा योजना के लिए 1,78,486 पौधे तथा ग्रीन क्रेडिट योजना के लिए 3,93,415 पौधे, कुल 5,71,901 पौधे तैयार किए जाने थे, जबकि वास्तविक रूप से केवल 4,65,295 पौधे ही रोपणियों में तैयार किए गए। अर्थात 1,06,606 पौधों की कमी पाई गई, जिन्हें अन्य स्रोतों से प्राप्त बताया गया।जांच प्रतिवेदन में उल्लेख है कि इन अतिरिक्त पौधों के नाम पर 32 लाख 77 हजार 10 रुपये का प्रमाणक तैयार कर व्यय भारित किया गया। यहीं से पूरा मामला वित्तीय अनियमितता और संभावित शासकीय धन के दुरुपयोग की दिशा में गंभीर हो जाता है।वन विभाग के सूत्रों का कहना है कि रिपोर्ट में तथ्य सामने आने के बावजूद अभी तक किसी भी अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध ठोस दंडात्मक कार्रवाई सामने नहीं आई है। विभाग के भीतर यह चर्चा भी चल रही है कि मामले को लंबा खींचकर जिम्मेदार अधिकारियों को बचाने का प्रयास किया जा सकता है। हालांकि इन चर्चाओं की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के अपर मुख्य सचिव मनोज कुमार पिंगुआ तथा प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख अरुण कुमार पाण्डेय इस मामले को किस गंभीरता से लेते हैं। क्या वे जांच प्रतिवेदन के आधार पर स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराकर वास्तविक जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करेंगे? या फिर करोड़ों रुपये की योजनाओं से जुड़े इस प्रकरण का भी वही हश्र होगा जो अक्सर विभागीय जांचों का होता आया है?वन एवं पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी योजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिकता बताई जाती रही है। ऐसे में मरवाही वनमंडल का यह मामला केवल वित्तीय अनियमितता का प्रश्न नहीं, बल्कि शासन की विश्वसनीयता और वन संरक्षण योजनाओं की पारदर्शिता की भी परीक्षा बन गया है।अब निगाहें शासन और विभाग के शीर्ष अधिकारियों पर टिकी हैं। यदि जांच प्रतिवेदन में दर्ज तथ्यों के आधार पर निष्पक्ष कार्रवाई होती है तो यह संदेश जाएगा कि सरकारी योजनाओं में अनियमितता करने वालों को किसी भी स्तर पर संरक्षण नहीं मिलेगा। लेकिन यदि मामला फाइलों में ही दबकर रह गया, तो यह सवाल लंबे समय तक उठता रहेगा कि आखिर 32.77 लाख रुपये के अतिरिक्त भुगतान और पौधों की कमी के लिए जिम्मेदार कौन है? और क्या उन्हें कभी जवाबदेह ठहराया जाएगा?