तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग में स्थानांतरण प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। विभागीय गलियारों से लेकर शिक्षकों के व्हाट्सएप समूहों तक एक ही चर्चा जोरों पर है कि स्थानांतरण के नाम पर कथित रूप से लाखों रुपए का खेल चल रहा है और बिना किसी पारदर्शी नीति के चुनिंदा लोगों के आदेश “सिंगल-सिंगल” जारी किए जा रहे हैं।विभागीय सूत्रों के अनुसार, विभाग में तीन-तीन लाख रुपए लेकर स्थानांतरण कराने की चर्चाएं खुलेआम हो रही हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिन शिक्षकों के स्थानांतरण प्रस्ताव जिला स्तर से होते हुए डीपीआई की अनुशंसा प्राप्त कर चुके हैं, उनकी फाइलें छह-छह माह से मंत्रालय और विभाग के बीच धूल फांक रही हैं, जबकि दूसरी ओर कुछ मामलों में अचानक आदेश जारी होने से पूरे तंत्र की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लग गया है।शिक्षक संगठनों का कहना है कि यदि सरकार स्थानांतरण नीति को पारदर्शी और नियमबद्ध तरीके से लागू कर रही है, तो फिर हजारों लंबित आवेदनों के बीच कुछ चुनिंदा आदेश किस आधार पर जारी किए जा रहे हैं? क्या विभाग के पास कोई स्पष्ट मापदंड है या फिर प्रभाव, पहुंच और कथित आर्थिक लेन-देन के आधार पर फाइलों का निपटारा किया जा रहा है?बिलासपुर और रायपुर जिले के कई शिक्षक समूहों में चल रही चर्चाओं ने इस मामले को और गंभीर बना दिया है। सोशल मीडिया मंचों पर शिक्षक खुलकर सवाल उठा रहे हैं कि जब डीपीआई द्वारा अनुशंसित प्रस्तावों पर भी कार्रवाई नहीं हो रही, तब आखिर किन परिस्थितियों में कुछ लोगों को स्थानांतरण का लाभ मिल रहा है। यह स्थिति न केवल विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है, बल्कि सरकार की पारदर्शिता और सुशासन के दावों को भी कटघरे में खड़ा करती है।विपक्षी दलों और कर्मचारी संगठनों का मानना है कि यदि स्थानांतरण प्रक्रिया में किसी प्रकार का आर्थिक लेन-देन हो रहा है तो इसकी उच्च स्तरीय जांच कराई जानी चाहिए। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि अब तक कितने आवेदन लंबित हैं, कितने प्रस्ताव डीपीआई की अनुशंसा के बाद भी रुके हुए हैं और किन आधारों पर विशेष मामलों में आदेश जारी किए जा रहे हैं।राज्य में सुशासन, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन के दावे करने वाली सरकार के लिए यह मामला एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। यदि शिक्षकों के बीच फैल रही आशंकाओं का समय रहते निराकरण नहीं किया गया, तो यह विवाद आने वाले समय में एक बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक मुद्दे का रूप ले सकता है।बड़ा सवाल यह है कि,क्या स्कूल शिक्षा विभाग में स्थानांतरण अब अधिकार नहीं बल्कि प्रभाव और पैसे का खेल बनता जा रहा है?क्या सरकार शिक्षकों की शंकाओं को दूर करने के लिए लंबित स्थानांतरण फाइलों और जारी आदेशों की सार्वजनिक समीक्षा कराएगी?या फिर “सुशासन” के दावों के बीच स्थानांतरण का यह रहस्य यूं ही बरकरार रहेगा?