ग्रीन क्रेडिट योजना में करोड़ों रुपये की अनियमितताओं का आरोप, उच्चस्तरीय जांच की मांग।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी ग्रीन क्रेडिट योजना एक बार फिर विवादों के घेरे में आ गई है।गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही जिले के मरवाही वनमंडल में संचालित इस योजना में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। शिकायतकर्ताओं ने पूरे मामले की स्वतंत्र एवं उच्चस्तरीय जांच कर दोषी अधिकारियों एवं कर्मचारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की मांग की है।शिकायत के अनुसार, ग्रीन क्रेडिट योजना के अंतर्गत बड़े आकार के पौधों का रोपण किया जाना था, ताकि पर्यावरण संरक्षण और वृक्षारोपण के निर्धारित लक्ष्य प्रभावी ढंग से पूरे हो सकें। आरोप है कि संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों ने योजना के मापदंडों का पालन नहीं करते हुए मनरेगा योजना के अंतर्गत तैयार छोटे पौधों का उपयोग कर दिया। इससे शासन को आर्थिक नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ योजना के मूल उद्देश्य को भी प्रभावित किया गया।शिकायतकर्ताओं का कहना है कि योजना के प्राक्कलन में प्रति पौधा लगभग 65 रुपये की तैयारी लागत निर्धारित थी। इसमें उपजाऊ मिट्टी, रेत, गोबर खाद, वर्मी कम्पोस्ट, दवाइयों तथा अन्य सामग्री की व्यवस्था की जानी थी। आरोप है कि इन सामग्रियों की आपूर्ति के नाम पर कागजी कार्रवाई कर लाखों रुपये के बिल तैयार किए गए, जबकि वास्तविक रूप से सामग्री की आपूर्ति नहीं की गई।आरोप यह भी है कि सामग्री क्रय प्रक्रिया में निर्धारित टेंडर नियमों एवं शासकीय खरीद नीति का पालन नहीं किया गया। शिकायतकर्ताओं ने दावा किया है कि पूर्व में विवादों में रह चुकी एक फर्म को कथित रूप से लाभ पहुंचाया गया और बिना पर्याप्त सत्यापन के भुगतान जारी कर दिया गया। आरोप है कि इस प्रक्रिया में एक करोड़ रुपये से अधिक की राशि का दुरुपयोग किया गया।ग्रीन क्रेडिट योजना के तहत पौधारोपण के लिए बड़े आकार के गड्ढे खोदे जाने थे, जिससे पौधों की बेहतर वृद्धि सुनिश्चित हो सके। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि निर्धारित मानकों के विपरीत छोटे गड्ढों में छोटे पौधों का रोपण कर दिया गया। इससे न केवल पौधारोपण की गुणवत्ता प्रभावित हुई, बल्कि रोपण कार्य के नाम पर अतिरिक्त राशि दर्शाकर आर्थिक अनियमितता की गई।इसके अलावा खाद, मिट्टी, मजदूरी भुगतान, परिवहन और अन्य मदों में भी कथित गड़बड़ियों के आरोप लगाए गए हैं। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि कई मदों में वास्तविक कार्य से अधिक खर्च दर्शाया गया और राशि का भुगतान संबंधित व्यक्तियों एवं ठेकेदारों के खातों में किया गया।शिकायत में वन विभाग के विभिन्न स्तरों के अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भूमिका की जांच की मांग की गई है। आरोपों में रोपण प्रभारी, परिक्षेत्र अधिकारियों, वनरक्षकों, नर्सरी प्रभारियों, एसडीओ स्तर के अधिकारियों तथा वनमंडल कार्यालय के कुछ कर्मचारियों के नाम भी शामिल बताए जा रहे हैं। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि इतने बड़े स्तर पर कथित अनियमितता बिना विभागीय मिलीभगत के संभव नहीं हो सकती।वहीं,स्थानीय नागरिकों एवं शिकायतकर्ताओं ने राज्य सरकार, प्रधान मुख्य वन संरक्षक, वन मंत्री तथा संबंधित जांच एजेंसियों से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह न केवल सरकारी धन के दुरुपयोग का मामला होगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी महत्वपूर्ण योजना की विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करेगा।विभागीय पक्ष का इंतजारसमाचार लिखे जाने तक वन विभाग के संबंधित अधिकारियों का आधिकारिक पक्ष प्राप्त नहीं हो सका था। यदि विभाग या नामित अधिकारी इस संबंध में अपना पक्ष प्रस्तुत करते हैं तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।अब सवाल यह है कि क्या केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी ग्रीन क्रेडिट योजना में लगाए गए इन गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी, या फिर मामला अन्य शिकायतों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा?यह संस्करण समाचार शैली में संतुलित, कानूनी रूप से सावधानीपूर्ण और प्रकाशन योग्य रूप में तैयार किया गया है।


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