विकास नंद/ सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ को वर्षों से “धान का कटोरा” कहा जाता रहा है, जहां की पहचान मुख्य रूप से धान उत्पादन से जुड़ी रही है। ऐसे में खरीफ सीजन के दौरान कृषि विभाग द्वारा किसानों को धान के स्थान पर दलहन, तिलहन, रागी, मक्का, कोदो, कुटकी एवं अन्य फसलों की खेती अपनाने के लिए प्रेरित किए जाने से चर्चा शुरू हो गई है। लोगों का मानना है कि प्रदेश की पहचान धान उत्पादन से होने के बावजूद किसानों को धान के विकल्प की ओर प्रोत्साहित करना सवाल खड़े करता है, जबकि कृषि विशेषज्ञ इसे फसल विविधीकरण की रणनीति का हिस्सा बता रहे हैं।इसी क्रम में महासमुंद जिले में कृषि विभाग द्वारा कृषक चौपाल का आयोजन किया जा रहा है। चौपाल में अधिकारियों एवं कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को कम पानी में बेहतर उत्पादन देने वाली दलहन, तिलहन, रागी और मक्का जैसी फसलों के लाभ बताए। अधिकारियों ने कहा कि इन फसलों से भूमि की उर्वरता में सुधार होता है तथा किसानों की आय बढ़ाने की संभावनाएं भी अधिक रहती हैं।कृषि विभाग द्वारा किसानों को बताया जा रहा है धान के स्थान पर दलहन, तिलहन, रागी, कोदो, कुटकी, मक्का एवं कपास की खेती करने वाले किसानों को शासन की ओर से 15 हजार रुपये प्रति एकड़ की आदान सहायता राशि दी जाएगी। वहीं, जो किसान पहले से इन फसलों की खेती कर रहे हैं, उन्हें एकीकृत किसान पोर्टल एवं एग्रीस्टैक में पंजीयन तथा डिजिटल क्रॉप सर्वे के बाद मान्य रकबे पर 10 हजार रुपये प्रति एकड़ की सहायता राशि प्रदान की जाएगी।कृषक चौपाल में किसानों को उन्नत खेती, बीज चयन, पोषक तत्व प्रबंधन और विभिन्न शासकीय योजनाओं की जानकारी भी दी गई तथा खरीफ सीजन में धान के साथ अन्य फसलों को अपनाकर खेती को अधिक लाभकारी एवं टिकाऊ बनाने की अपील की जा रही है।हालांकि, इस अभियान को लेकर स्थानीय स्तर पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे जल संरक्षण, मिट्टी की सेहत और आय के विविध स्रोत बढ़ाने की दिशा में सकारात्मक कदम मान रहे हैं, जबकि कुछ का कहना है कि धान उत्पादन के लिए प्रसिद्ध राज्य में धान से दूरी बनाने का संदेश भ्रम की स्थिति पैदा कर सकता है। ऐसे में फसल विविधीकरण को लेकर सरकार की नीति और उसके दीर्घकालिक प्रभाव पर बहस तेज होने लगी है।