नूर मोहम्मद /श्रीनिवास ,गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (सर्वव्यापी)
जीपीएम जिले में इंजेक्शन, नाइट्रा गोलियां और नशीले कफ सिरप का बढ़ता कारोबार युवाओं को नशे की दलदल में धकेल रहा है। दूसरी ओर, नशे के खिलाफ सबसे महत्वपूर्ण हथियार—समाज कल्याण विभाग के अंतर्गत संचालित नशा मुक्ति केंद्र-खुद संसाधनों के अभाव में संघर्ष कर रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर बढ़ते नशे के बीच पूरा जिला केवल 15 बेड के भरोसे कैसे चल रहा है?नवंबर 2024 से संचालित यह पुनर्वास केंद्र अब तक 174 से अधिक लोगों को भर्ती कर चुका है, जबकि 150 से ज्यादा मरीज पूरी तरह नशामुक्त होकर सामान्य जीवन में लौट चुके हैं। यह सफलता बताती है कि केंद्र प्रभावी है, लेकिन इसकी क्षमता जिले की जरूरतों के सामने बेहद छोटी साबित हो रही है।
वेटिंग लिस्ट बढ़ रही, मरीज लौट रहे खाली हाथ
सूत्रों के अनुसार, केंद्र में भर्ती के लिए लगातार प्रतीक्षा सूची बनी रहती है। सीमित सीटों के कारण कई मरीजों को भर्ती किए बिना वापस भेजना पड़ता है। सवाल यह है कि जब जिले में नशे के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, तब अब तक केंद्र की क्षमता 15 से बढ़ाकर 45–50 बेड क्यों नहीं की गई?सरकारी भवन नहीं, हर महीने किराये में बह रहा सरकारी पैसासबसे चौंकाने वाली बात यह है कि डेढ़ वर्ष के करीब संचालन के बाद भी नशा मुक्ति केंद्र को अपना सरकारी भवन उपलब्ध नहीं कराया जा सका है। मजबूरी में किराये के भवन से संचालन हो रहा है, जहां हर महीने लगभग 25 हजार रुपये भवन किराये और 5 से 10 हजार रुपये बिजली बिल पर खर्च हो रहे हैं।यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब सरकारी भवन उपलब्ध कराया जा सकता है, तब हर महीने सरकारी राशि निजी भवनों पर क्यों खर्च की जा रही है? यदि स्थायी भवन मिल जाए तो यही राशि मरीजों की सुविधा, दवाइयों, परामर्श और पुनर्वास सेवाओं को मजबूत करने में लगाई जा सकती है।मैदान नहीं, तो कैसे होगा पुनर्वास?नशा मुक्ति केवल दवाइयों से नहीं होती, बल्कि योग, खेल, व्यायाम और सामूहिक गतिविधियां भी उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं। लेकिन केंद्र के पास अपना परिसर ही नहीं है। खेलकूद और फिजिकल एक्टिविटी के अभाव में पुनर्वास प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।
विशेषज्ञ भी मानते हैं कि स्वस्थ वातावरण और नियमित शारीरिक गतिविधियां मरीजों को दोबारा नशे की ओर लौटने से रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।जिले में बढ़ रहा नशे का खतरा, लेकिन संसाधन वहीं के वहींजीपीएम जिले में पिछले एक वर्ष के दौरान इंजेक्शन के माध्यम से नशा, नाइट्रा गोलियों और नशीले सिरप का चलन तेजी से बढ़ा है।
ग्रामीण क्षेत्रों तक इसकी पहुंच चिंता का विषय बन चुकी है।
ऐसे समय में जिले के एकमात्र नशा मुक्ति केंद्र की सीमित क्षमता पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर रही है।सवाल जिनका जवाब जरूरी है- बढ़ते नशे के बावजूद नशा मुक्ति केंद्र का सेटअप अब तक केवल 15 बेड ही क्यों?- मरीजों की लंबी प्रतीक्षा सूची के बावजूद क्षमता बढ़ाने का प्रस्ताव कब बनेगा?- आखिर आज तक स्थायी सरकारी भवन क्यों उपलब्ध नहीं कराया गया?- हर महीने किराया और बिजली पर खर्च हो रहे सरकारी धन की भरपाई कौन करेगा?- क्या युवाओं को नशे से बचाने के लिए सरकार जीपीएम में एक आधुनिक, 50 बेड वाले समर्पित नशा मुक्ति एवं पुनर्वास केंद्र की स्थापना करेगी?
सर्वव्यापी टीम की पड़ताल बताती है कि नशे के खिलाफ लड़ाई केवल जागरूकता अभियानों से नहीं जीती जा सकती। इसके लिए मजबूत पुनर्वास व्यवस्था, पर्याप्त बेड क्षमता और स्थायी सरकारी अधोसंरचना की तत्काल आवश्यकता है। यदि समय रहते व्यवस्था नहीं सुधरी, तो बढ़ते नशे की कीमत पूरे समाज को चुकानी पड़ सकती है।


