ढैंचा की हरियाली से बढ़ रही मिट्टी की ताकत, महासमुंद के किसान अपना रहे टिकाऊ खेती का मॉडल। - Sarvavyapi ढैंचा की हरियाली से बढ़ रही मिट्टी की ताकत, महासमुंद के किसान अपना रहे टिकाऊ खेती का मॉडल। - Sarvavyapi

ढैंचा की हरियाली से बढ़ रही मिट्टी की ताकत, महासमुंद के किसान अपना रहे टिकाऊ खेती का मॉडल।

Share Now

विकास नंद/ सर्वव्यापी

जिले में मृदा स्वास्थ्य संरक्षण और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने के लिए कृषि विभाग द्वारा हरी खाद (ढैंचा) के उपयोग को प्रोत्साहित किया जा रहा है। कलेक्टर विनय कुमार लंगेह के निर्देश पर संचालित ‘खेत बचाओ अभियान’ के तहत किसानों को हरी खाद अपनाने के लिए प्रेरित किया गया है, जिसका सकारात्मक असर अब खेतों में दिखाई देने लगा है।अभियान के अंतर्गत जिले के सभी विकासखंडों में 376 हेक्टेयर क्षेत्र के लिए 103 क्विंटल ढैंचा बीज का वितरण किया गया है। इसके माध्यम से 813 किसान अपने खेतों में हरी खाद तकनीक अपना रहे हैं। कृषि विभाग के मार्गदर्शन में किसानों ने ढैंचा की बुवाई कर फूल आने से पहले उसे खेत में पलट दिया है। सड़ने के बाद यही फसल जैविक खाद में बदलकर धान की खेती के लिए खेतों की उर्वरता बढ़ाएगी।विकासखंड बसना के ग्राम बड़ेसाजापाली के किसान हिमांशु बंजारे ने अपने 0.80 हेक्टेयर खेत में ढैंचा की खेती की है। उनका कहना है कि हरी खाद से खेती की लागत घटेगी और मिट्टी की सेहत बेहतर होगी। वहीं पिथौरा विकासखंड के ग्राम कौहाकुड़ा के किसान रूक्मण नायक ने 7 एकड़ भूमि में तथा बसना के भौंरादादर के किसान गोकुल पटेल ने भी अपने खेतों में ढैंचा बोया है। किसानों का मानना है कि इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होगी और भूमि की उर्वराशक्ति में सुधार आएगा।कृषि विशेषज्ञों के अनुसार ढैंचा एक दलहनी हरी खाद फसल है, जो वातावरण से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी में उपलब्ध कराती है। इसके अलावा यह फास्फोरस, जिंक और आयरन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने में भी सहायक है। ढैंचा के सड़ने से बनने वाला ह्यूमस मिट्टी को भुरभुरा बनाता है, जिससे हवा और पानी का संचार बेहतर होता है तथा फसलों की जड़ों का विकास और उत्पादन क्षमता बढ़ती है। साथ ही यह मिट्टी की जलधारण क्षमता बढ़ाकर कम सिंचाई में भी फसलों को बेहतर बढ़ने में मदद करता है।

उप संचालक कृषि एफ.आर. कश्यप ने किसानों से अपील की है कि धान सहित अन्य खरीफ फसलों की बुवाई से पहले ढैंचा, सनई या अन्य हरी खाद वाली फसलों का उपयोग करें। उन्होंने कहा कि हरी खाद अपनाने से रासायनिक उर्वरकों पर खर्च कम होता है, मिट्टी की दीर्घकालीन उर्वराशक्ति बनी रहती है और पर्यावरण अनुकूल, टिकाऊ तथा लाभकारी खेती को बढ़ावा मिलता है।


Share Now

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You cannot copy content of this page

error: Content is protected !!