मुख्यमंत्री से मिलने को रोती-बिलखती महिलाओं को मंच तक नहीं पहुंचने दिया गया? भाजपा कार्यालय लोकार्पण के दौरान वायरल वीडियो ने खड़े किए कई सवाल। - Sarvavyapi मुख्यमंत्री से मिलने को रोती-बिलखती महिलाओं को मंच तक नहीं पहुंचने दिया गया? भाजपा कार्यालय लोकार्पण के दौरान वायरल वीडियो ने खड़े किए कई सवाल। - Sarvavyapi

मुख्यमंत्री से मिलने को रोती-बिलखती महिलाओं को मंच तक नहीं पहुंचने दिया गया? भाजपा कार्यालय लोकार्पण के दौरान वायरल वीडियो ने खड़े किए कई सवाल।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

कबीरधाम जिले में आयोजित भाजपा के नए कार्यालय के लोकार्पण समारोह का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह, गृहमंत्री एवं उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा, भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व, प्रदेश अध्यक्ष तथा अनेक वरिष्ठ पदाधिकारी उपस्थित थे। इसी दौरान कुछ महिलाएं अपनी समस्याओं को लेकर रोते-बिलखते मंच के समीप पहुंचीं और मुख्यमंत्री से सीधे मिलने का प्रयास करती दिखाई दीं।वायरल वीडियो में दिखाई दे रहा है कि महिलाओं की मुख्यमंत्री से प्रत्यक्ष मुलाकात नहीं हो सकी। बताया जा रहा है कि उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने स्वयं महिलाओं से आवेदन पत्र लेकर मुख्यमंत्री को सौंप दिए। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि महिलाओं की शिकायतों पर तत्काल क्या कार्रवाई हुई अथवा उन्हें मुख्यमंत्री से मिलने से क्यों रोका गया। इस संबंध में सरकार या प्रशासन की ओर से आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने आना शेष है।घटना ने विपक्ष के साथ-साथ राजनीतिक विश्लेषकों को भी सरकार की जनसुनवाई व्यवस्था पर प्रश्न उठाने का अवसर दे दिया है। आलोचकों का कहना है कि यदि मुख्यमंत्री स्वयं जनता के बीच मौजूद थे, तो अपनी पीड़ा लेकर आई महिलाओं को कुछ क्षण का समय देकर उनकी बात सुनना लोकतांत्रिक संवेदनशीलता का परिचायक होता। दूसरी ओर भाजपा समर्थकों का तर्क है कि बड़े आयोजनों में सुरक्षा प्रोटोकॉल और समयबद्ध कार्यक्रमों के कारण प्रत्यक्ष मुलाकात हमेशा संभव नहीं होती, इसलिए आवेदन लेना भी समस्या समाधान की प्रक्रिया का हिस्सा माना जाना चाहिए।कबीरधाम गृहमंत्री एवं उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा का गृह जिला है। ऐसे में स्थानीय महिलाओं का इस प्रकार भावुक होकर मंच तक पहुंचने का प्रयास राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि किसी जिले की महिलाएं सार्वजनिक मंच पर रोते हुए अपनी बात मुख्यमंत्री तक पहुंचाने को विवश हों, तो यह स्थानीय प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और शिकायत निवारण तंत्र की प्रभावशीलता पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा लगातार “सुशासन” और “जनसेवा” को अपनी पहचान बताती रही है। ऐसे में इस तरह के दृश्य विपक्ष को सरकार पर हमला करने का अवसर प्रदान करते हैं। कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल इसे जनता और सरकार के बीच बढ़ती दूरी का प्रतीक बताकर राजनीतिक मुद्दा बना सकते हैं।यह भी प्रश्न उठ रहा है कि यदि महिलाओं की समस्याएं पहले ही संबंधित अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों तक पहुंच चुकी थीं, तो उन्हें मुख्यमंत्री के सार्वजनिक कार्यक्रम तक आने की आवश्यकता क्यों पड़ी। क्या स्थानीय स्तर पर उनकी शिकायतों का समाधान नहीं हुआ था? यदि नहीं, तो इसकी जवाबदेही किसकी तय होगी?सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो को लेकर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे सरकार की संवेदनहीनता बता रहे हैं, जबकि कुछ का कहना है कि केवल एक वीडियो के आधार पर पूरी घटना का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। इसलिए आवश्यक है कि सरकार स्वयं इस मामले में तथ्यात्मक स्थिति स्पष्ट करे और यदि महिलाएं किसी वास्तविक समस्या से जूझ रही हैं तो उसकी निष्पक्ष जांच कर शीघ्र समाधान सुनिश्चित करे।लोकतंत्र में जनता की आवाज सबसे महत्वपूर्ण होती है। किसी भी सरकार की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास होता है और सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी जनता की पीड़ा को सुनना तथा उसका समाधान करना है। इसलिए यह प्रकरण केवल एक वायरल वीडियो तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि सरकार के लिए आत्ममंथन का विषय भी बनना चाहिए कि भविष्य में ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न न हों और आम नागरिक स्वयं को शासन-प्रशासन से जुड़ा हुआ महसूस करे।


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