क्या ईमानदार अधिकारी भी सिस्टम के आगे बेबस? वनमंडल की चुनौतियों के बीच डीएफओ पर बढ़ता दबाव। - Sarvavyapi क्या ईमानदार अधिकारी भी सिस्टम के आगे बेबस? वनमंडल की चुनौतियों के बीच डीएफओ पर बढ़ता दबाव। - Sarvavyapi

क्या ईमानदार अधिकारी भी सिस्टम के आगे बेबस? वनमंडल की चुनौतियों के बीच डीएफओ पर बढ़ता दबाव।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

किसी भी विभाग की कार्यशैली का मूल्यांकन केवल वर्तमान अधिकारी के आधार पर नहीं किया जा सकता। वर्षों से चली आ रही व्यवस्थागत कमियों, लंबित मामलों और प्रशासनिक निर्णयों का प्रभाव नए अधिकारियों पर भी पड़ता है। मरवाही वनमंडल में भी कुछ ऐसा ही परिदृश्य देखने को मिल रहा है, जहां युवा भारतीय वन सेवा (आईएफएस) अधिकारी एवं वर्तमान वनमंडलाधिकारी ग्रीष्मी चांद एक ओर विभागीय व्यवस्था को सुदृढ़ करने और अनियमितताओं पर नियंत्रण की कोशिश कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हें अनेक प्रशासनिक और आंतरिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।विभागीय सूत्रों के अनुसार, मरवाही वनमंडल में पूर्व वर्षों में हुए कथित वित्तीय एवं प्रशासनिक अनियमितताओं को लेकर कई शिकायतें संबंधित उच्च अधिकारियों तक पहुंची थीं। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि इन मामलों में आवश्यक जांच और कार्रवाई अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ सकी। यदि शिकायतों में पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हैं, तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि उन मामलों पर अंतिम निर्णय और जवाबदेही अब तक क्यों तय नहीं हो सकी।ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि जिन मामलों का संबंध पूर्व के कार्यकाल से है, उनका बोझ वर्तमान अधिकारी पर क्यों दिखाई देने लगा है। किसी भी अधिकारी का मूल्यांकन उसके अपने कार्यकाल, निर्णयों और कार्यशैली के आधार पर होना चाहिए, न कि पूर्व में हुई कथित अनियमितताओं के आधार पर।मरवाही वनमंडल में पदस्थ डीएफओ ग्रीष्मी चांद को जानने वाले अनेक लोगों का कहना है कि वे अनुशासनप्रिय, कार्य के प्रति गंभीर और नियमों के पालन पर जोर देने वाली अधिकारी हैं। विभागीय कार्यों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के प्रयासों के कारण स्वाभाविक रूप से कुछ लोगों के हित प्रभावित हो सकते हैं। ऐसे में उनके विरुद्ध असंतोष या विरोध की स्थिति भी बनना असामान्य नहीं माना जा सकता। हालांकि किसी भी प्रकार के आरोप या शिकायत का निर्णय तथ्यों और निष्पक्ष जांच के आधार पर ही होना चाहिए।प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि यदि किसी विभाग में पूर्व में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं और उनकी जांच वर्षों तक लंबित रहती है, तो उसका सबसे अधिक नुकसान वर्तमान व्यवस्था और ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों को उठाना पड़ता है। इससे न केवल विभाग की कार्यप्रणाली प्रभावित होती है, बल्कि जनता का विश्वास भी कमजोर पड़ता है।यह भी आवश्यक है कि यदि पूर्व अधिकारियों के विरुद्ध प्राप्त शिकायतों में पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं, तो सक्षम स्तर पर उनकी निष्पक्ष एवं समयबद्ध जांच कराई जाए। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो दोषियों पर कार्रवाई हो, और यदि आरोप निराधार हों तो उन्हें भी स्पष्ट रूप से समाप्त किया जाए। वर्षों तक फाइलों का लंबित रहना किसी भी दृष्टि से सुशासन का संकेत नहीं माना जा सकता।मरवाही वनमंडल जैसे संवेदनशील क्षेत्र में वन संरक्षण, जैव विविधता, पौधरोपण और सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन की बड़ी जिम्मेदारी होती है। ऐसे में विभागीय ऊर्जा का उपयोग आपसी खींचतान के बजाय जनहित और वन संरक्षण के कार्यों में होना चाहिए।अब निगाहें विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों पर टिकी हैं। आवश्यकता इस बात की है कि वे लंबित शिकायतों पर निष्पक्ष निर्णय लें, वर्तमान अधिकारियों को स्पष्ट प्रशासनिक सहयोग दें तथा यह सुनिश्चित करें कि ईमानदारी से कार्य करने वाले अधिकारियों का मनोबल कमजोर न हो। किसी भी विभाग की साख तभी मजबूत होती है जब भ्रष्टाचार के आरोपों की निष्पक्ष जांच भी हो और ईमानदार अधिकारियों को संस्थागत संरक्षण भी प्राप्त हो।मरवाही वनमंडल का यह मामला केवल एक अधिकारी का नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक व्यवस्था की परीक्षा भी है, जिसमें यह तय होना है कि जवाबदेही केवल कागजों तक सीमित रहेगी या वास्तव में दोषी और निर्दोष के बीच निष्पक्ष अंतर स्थापित किया जाएगा।


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