तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में अब लगभग ढाई वर्ष का समय शेष है। ऐसे समय में सत्ता पक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल योजनाओं की घोषणा करना नहीं, बल्कि आम जनता के बीच अपनी कार्यशैली को लेकर बने नजरिए को बदलना भी है। प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से लगातार उठ रही शिकायतें, प्रशासनिक प्रक्रियाओं में देरी, जनसमस्याओं के निराकरण की धीमी गति तथा स्थानीय स्तर पर जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच समन्वय की कमी जैसे मुद्दे राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बने हुए हैं।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी सरकार की लोकप्रियता केवल मुख्यमंत्री के व्यक्तित्व से नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यक्षमता से तय होती है। यदि निचले स्तर पर जनता को समय पर न्याय और सुविधाएं नहीं मिलतीं, तो उसका सीधा असर सरकार की छवि पर पड़ता है। विपक्ष भी ऐसे मुद्दों को लगातार उठाने का प्रयास करता है।सत्ता पक्ष के भीतर भी यह चर्चा सुनाई देती है कि कई कार्यकर्ता अपनी अपेक्षाओं के अनुरूप संवाद और भागीदारी महसूस नहीं कर रहे हैं। हालांकि इस संबंध में सार्वजनिक रूप से बहुत कम लोग अपनी राय रखते हैं, इसलिए इस तरह की चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की जा सकती। फिर भी राजनीतिक हलकों में यह माना जा रहा है कि संगठन और सरकार के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है।ऐसे समय में मुख्यमंत्री सचिवालय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह, सचिव पी. दयानंद तथा मुख्यमंत्री सचिवालय में पदस्थ अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के सामने केवल फाइलों का त्वरित निस्तारण ही नहीं, बल्कि शासन की संवेदनशील और जवाबदेह छवि स्थापित करने की भी बड़ी जिम्मेदारी है। यदि जनता से जुड़े मामलों की नियमित समीक्षा हो, शिकायतों का समयबद्ध निराकरण सुनिश्चित किया जाए और विभिन्न विभागों के कार्यों की प्रभावी निगरानी की जाए, तो इसका सकारात्मक संदेश प्रदेशभर में जा सकता है।राजनीति में यह स्थापित तथ्य है कि चुनाव केवल नारों से नहीं, बल्कि जनता के अनुभवों से जीते जाते हैं। यदि आम नागरिक को तहसील, थाना, अस्पताल, स्कूल, पंचायत और जिला कार्यालय में सम्मानजनक व्यवहार तथा समय पर समाधान मिलता है, तो उसका प्रभाव सीधे सरकार के पक्ष में जाता है। इसके विपरीत यदि लोगों को बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ें, शिकायतों पर कार्रवाई न हो या प्रशासनिक संवेदनशीलता का अभाव दिखे, तो सरकार की उपलब्धियां भी अपेक्षित राजनीतिक लाभ नहीं दिला पातीं।आने वाले ढाई वर्ष इसलिए निर्णायक माने जा रहे हैं क्योंकि यही वह समय है जिसमें सरकार अपनी प्रशासनिक कार्यप्रणाली को और अधिक प्रभावी, पारदर्शी तथा जनोन्मुखी बनाकर जनता का विश्वास मजबूत कर सकती है। अंततः सरकार की वास्तविक परीक्षा चुनावी मंचों पर नहीं, बल्कि जनता के बीच प्रशासन की कार्यशैली और सुशासन के अनुभव पर होगी।यदि चाहें, इसे और अधिक संपादकीय शैली में तीखा या अधिक संतुलित विश्लेषणात्मक स्वर में भी तैयार किया जा सकता है।


