तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
“चला जांवव बहुत दूर…” ए सिरिफ चार सब्द नइ हवंय, बल्कि आज के समाज मं हजारों-लाखों मनखे के मन के आवाज आय। ए आवाज ओ मनखे मन के आय, जऊन मन अपन दुख, पीरा, उपेक्षा, अपमान अऊ संघर्ष ल अपन भीतर दबाय बइठे हवंय। बाहर ले ओमन हँसत दिखथें, फेर भीतर ले रोज टूटत रहिथें। जब मनखे ल अपन मेहनत के मोल नइ मिलय, अपन सच के सम्मान नइ मिलय अऊ अपन ईमानदारी घलो बोझ लगय, त ओकरे मन मं एकेच बात उठथे—”चला जांवव बहुत दूर…”आज समाज तेजी ले बदलत हे। रिश्ता-नाता के जगह स्वार्थ ले लेहे, अपनापन के जगह मतलब आ गेहे। जिहां मनखे एक-दूसर के दुख मं खड़े होवत रहिन, आज ओतकेच मनखे दूसर के गिरइया देखके खुश हो जाथें। ए बदलाव सिरिफ शहर तक सीमित नइ हे, गांव-गांव अऊ घर-घर तक पहुँच गे हे। एही कारण आय कि आज हर दूसर मनखे मानसिक तनाव, अकेलापन अऊ निराशा ले जूझत दिखत हे।सबले जियादा पीरा त ओ मनखे ल होथे जऊन जिनगी भर ईमानदारी के रद्दा मं चलिस। जऊन कभू दूसर के हक नइ मारिस, कभू झूठ अऊ बेईमानी के सहारा नइ लीस। फेर जब ओही मनखे ल अपमान, उपेक्षा अऊ संघर्ष के बदला मं कुछो नइ मिलय, त ओकर मन ह थक जाथे। ओकर भीतर के आवाज कहिथे—अब बहुत होगे, अब चला जांवव बहुत दूर।फेर सवाल ए उठथे कि आखिर दूर कहां जाही? का दुनिया ले भाग जाना समस्या के समाधान आय? का अपन माटी, अपन मनखे अऊ अपन जिम्मेदारी ल छोड़ देना सही रद्दा आय? जवाब साफ हे—नइ। काबर कि जिहां मनखे जाही, ओकर मन के पीरा घलो संग जाही। दुख ले भागे ले दुख खतम नइ होवय, बल्कि ओकर सामना करे ले मनखे मजबूत बनथे।आज जरूरत ए बात के हे कि समाज अपन सोच ल बदले। जऊन मनखे चुपचाप संघर्ष करत हे, ओकर पीरा ल समझे। दूसर के सफलता ले जलइया के बदला, ओकर हिम्मत बढ़ाए। अपन परिवार मं, अपन दफ्तर मं, अपन समाज मं अइसन माहौल बनाय जावय जिहां मनखे खुलके अपन बात कह सकय। काबर कि कभू-कभू एक मीठा सब्द घलो टूटत मनखे ल फेर ले जीए के हिम्मत दे देथे।सरकार, समाज, परिवार अऊ संस्थान—सबके जिम्मेदारी बनथे कि मानसिक तनाव, सामाजिक उपेक्षा अऊ अकेलापन जइसने समस्या ल गंभीरता ले लेवंय। सिरिफ आर्थिक विकास ले समाज मजबूत नइ बनय। जब तक मनखे के मन सुरक्षित नइ होही, तब तक विकास अधूरा रहिही।जिनगी संघर्ष के दूसर नाव आय। दुख आही, अपमान आही, असफलता घलो आही। फेर ए सब्बो के बाद घलो सूरज रोज उगथे। रात कतको लंबा होवय, बिहनिया जरूर होथे। ए प्रकृति के संदेश आय कि अंधियार कभू स्थायी नइ होवय।एखर सेती “चला जांवव बहुत दूर” के मतलब जिनगी ले हार मान लेना नइ होय। एखर सही मतलब हे—नकारात्मक सोच ले दूर जावव, स्वार्थ ले दूर जावव, झूठ अऊ बेईमानी ले दूर जावव। अपन भीतर के हिम्मत, भरोसा अऊ उम्मीद के नवा उजाला तक पहुँचव।आज जरूरत भागे के नइ, बल्कि बदले के हे—अपन सोच बदले के, समाज बदले के अऊ व्यवस्था बदले के। काबर कि जऊन मनखे संघर्ष के बाद घलो डटके खड़े रहिथे, इतिहास आखिरकार ओकरे नाव ल याद रखथे।चला जांवव बहुत दूर… फेर निराशा ले, अन्याय ले, स्वार्थ ले अऊ अंधियार ले। अपन माटी, अपन संस्कार अऊ अपन उम्मीद ले कभू दूर झन जावव। काबर कि एही मनखे के असली ताकत अऊ जिनगी के असली पहचान आय।


