तरुण कौशिक, संपादक, सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार के विरुद्ध “जीरो टॉलरेंस” की बात करने वाली विष्णु देव साय सरकार और वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग अब एक ऐसे मामले को लेकर सवालों के घेरे में है, जिसकी विभागीय फाइलें स्वयं गंभीर वित्तीय अनियमितताओं की ओर संकेत करती हैं। मरवाही वनमंडल के अंतर्गत रोपनी प्रबंधन समिति चिवघोना तथा नेचर कैम्प प्रबंधन समिति जामवंत माड़ा गगनई (साल्हेकोटा परिसर) में कथित फर्जी समितियों के गठन और शासकीय राशि के दुरुपयोग की शिकायत पर विभागीय जांच हुई, आरोप तय हुए, आरोप पत्र जारी हुए, लेकिन वर्षों बाद भी आपराधिक प्रकरण दर्ज नहीं हुआ।सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब विभागीय जांच में अधिकारियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा की गई और आरोप पत्र तक जारी हो गए, तब भारतीय न्याय व्यवस्था के अनुसार संभावित आपराधिक पहलू की जांच और एफआईआर की दिशा में कार्रवाई क्यों नहीं हुई?मुख्य वन संरक्षक, बिलासपुर वृत्त द्वारा 16 फरवरी 2023 को भेजे गए प्रतिवेदन में स्पष्ट उल्लेख है कि शिकायत की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की गई थी। समिति की रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन उपवनमंडलाधिकारी ए.के. चटर्जी, तत्कालीन उपवनमंडलाधिकारी संजय त्रिपाठी तथा तत्कालीन और वर्तमान वन परिक्षेत्र अधिकारियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा की गई। प्रतिवेदन में यह भी उल्लेख है कि अन्य दोषी कर्मचारियों के विरुद्ध सक्षम स्तर पर कार्रवाई की जा रही है।इसके बाद सचिवालय स्तर पर तैयार की गई नस्तियों में यह दर्ज है कि रोपनी प्रबंधन समिति और नेचर कैम्प प्रबंधन समिति के नाम पर विभिन्न योजनाओं की शासकीय राशि के संबंध में गंभीर वित्तीय अनियमितता के आरोपों पर संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध आरोप पत्र जारी करने का प्रस्ताव तैयार किया गया। विभाग ने अलग-अलग अधिकारियों के विरुद्ध पृथक अनुशासनात्मक प्रकरण भी प्रारंभ किए।विभागीय दस्तावेजों के अनुसार श्री संजय त्रिपाठी के विरुद्ध 24 अप्रैल 2023 को आरोप पत्र जारी किया गया। बाद में वर्ष 2024 में प्राप्त शिकायत पर स्वयं विभाग ने स्वीकार किया कि नई शिकायत के बिंदु वही हैं, जिन पर पहले से विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई चल रही है।यहीं से कई गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।यदि विभाग स्वयं यह स्वीकार कर रहा था कि फर्जी समिति गठन, शासकीय राशि की हेराफेरी और वित्तीय अनियमितता जैसे आरोपों पर कार्रवाई चल रही है, तो फिर मामला केवल विभागीय जांच तक सीमित क्यों रहा? यदि प्रथम दृष्टया वित्तीय गड़बड़ी सामने आई थी, तो क्या पुलिस या आर्थिक अपराध अन्वेषण एजेंसी को इसकी जानकारी दी गई? यदि नहीं, तो क्यों?वन विभाग के जानकारों का कहना है कि यदि किसी प्रकरण में शासकीय धन के दुरुपयोग, फर्जी समिति गठन अथवा दस्तावेजों में हेराफेरी जैसे आरोप प्रथम दृष्टया प्रमाणित होते हैं, तो केवल विभागीय दंडात्मक कार्रवाई पर्याप्त नहीं मानी जाती। ऐसे मामलों में तथ्यों के आधार पर आपराधिक कार्रवाई पर भी विचार किया जा सकता है। हालांकि अंतिम निर्णय सक्षम प्राधिकारी और जांच एजेंसियों का होता है।अब सवाल मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप से भी पूछा जा रहा है कि जब उनकी सरकार भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर कार्रवाई का दावा करती है, तब मरवाही की यह बहुचर्चित फाइल वर्षों से अंतिम निष्कर्ष तक क्यों नहीं पहुंच सकी? यदि आरोप गंभीर थे, तो दोषियों के विरुद्ध केवल निलंबन या विभागीय कार्रवाई तक ही मामला सीमित क्यों रहा? क्या किसी प्रभावशाली संरक्षण के कारण आपराधिक कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकी, या फिर जांच प्रक्रिया बीच रास्ते में ही ठंडी पड़ गई?यह भी जांच का विषय है कि जिन अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए गए थे, उनमें से कितनों के विरुद्ध विभागीय कार्यवाही का अंतिम परिणाम क्या रहा? कितनों को दोषमुक्त किया गया, कितनों पर दंड लगाया गया और किन मामलों में कार्यवाही आज भी लंबित है?अब आवश्यकता इस बात की है कि राज्य सरकार पूरे मामले की वर्तमान स्थिति सार्वजनिक करे। यदि विभागीय जांच में गंभीर वित्तीय अनियमितता के तथ्य सामने आए थे, तो यह स्पष्ट किया जाए कि आपराधिक कार्रवाई क्यों नहीं हुई। यदि पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले, तो उसका आधार भी सार्वजनिक किया जाए।


