संपादक की कलम से…सादगी, संवेदना और संकल्प का दूसरा नाम है सोनमणि बोरा।

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तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/

किसी भी राज्य की आत्मा वहाँ के जनजातीय समाज में बसती है। उनकी संस्कृति, जीवनशैली, परंपरा और प्रकृति से प्रेम ही उस भूमि की असली पहचान होती है। और जब किसी प्रशासनिक अधिकारी के मन में इन मूल्यों के प्रति अगाध श्रद्धा, संवेदनशीलता और सेवा-भावना हो, तब इतिहास रचते देर नहीं लगती। ऐसे ही हैं छत्तीसगढ़ कैडर के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी सोनमणि बोरा जो जनसेवा को अपने कर्म का आधार मानते हैं, और जिनके पदचिन्हों से विकास, संस्कार और संवेदनशीलता की सुगंध आती है।प्रशासन में एक अध्याय का नाम: सोनमणि बोरासोनमणि बोरा का नाम छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक व्यवस्था में एक ऐसी जीवंत गाथा बन चुका है, जो अपने पीछे केवल नीतियां नहीं, बल्कि मानवीयता की एक गहराई छोड़ता है। चाहे वह बिलासपुर नगर निगम आयुक्त के रूप में उनका कार्यकाल हो, जिला पंचायत सीईओ, बिलासपुर कलेक्टर, या संभागायुक्त, हर पद पर उन्होंने केवल योजनाएं लागू नहीं कीं, बल्कि जनता के मन को पढ़कर, उनके हित में जी कर कार्य किया।जांजगीर-चांपा कलेक्टर के रूप में उनकी लोकप्रियता इस हद तक थी कि उनके स्थानांतरण की खबर सुनते ही जनता सड़कों पर उतर आई। एक प्रशासनिक अधिकारी के लिए यह जनसमर्पण और जनसम्मान विरल और अनुपम उदाहरण है।हरियाली के सजग प्रहरीकवर्धा कलेक्टर रहते हुए एक दिन में लाखों पौधे लगवाकर उन्होंने पर्यावरण के क्षेत्र में ऐसा कार्य किया, जो गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज हुआ। यह केवल एक रिकॉर्ड नहीं था, यह भविष्य की पीढ़ियों को एक हरित आशीर्वाद था।केंद्रीय सेवा में भी संवेदनशीलता की छापभारत सरकार के अधीन सेवा में भी उन्होंने वह संवेदनशीलता नहीं छोड़ी, जो उन्हें भीड़ से अलग करती है। जहाँ भी गए, वहाँ छत्तीसगढ़ की माटी, उसकी संस्कृति, और जनजातीय समाज की आत्मा को अपने कार्यों के माध्यम से जीवंत बनाए रखा।आदिवासी समाज के सच्चे हितैषीआज वे आदिम जाति और अनुसूचित जाति विकास विभाग के प्रमुख सचिव हैं और इस भूमिका में उन्होंने शिक्षा, रोजगार, संस्कृति और आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में मील के पत्थर गढ़े हैं।उनकी कल्पना से जन्मा छत्तीसगढ़ का आदिवासी संग्रहालय आज प्रदेश की सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक बन चुका है। यह संग्रहालय केवल वस्तुओं का संग्रह नहीं, बल्कि जीवंत इतिहास, जीवंत संस्कृति, और जीवंत संवेदनाओं का घर है।धरोहरों को दी नई पहचानउन्होंने बिलासपुर संभाग में पदस्थ रहते हुए महामाया मंदिर, मदकूदीप, मल्हार, तालागांव, और कोटमी सोनार जैसे सांस्कृतिक स्थलों को केवल संरक्षित ही नहीं किया, बल्कि पर्यटन और सांस्कृतिक चेतना का केंद्र बनाया। यह कार्य न केवल प्रशासनिक दूरदर्शिता का परिणाम है, बल्कि आस्था और परंपरा के प्रति उनकी श्रद्धा का भी प्रमाण है।खेलों के संरक्षक: ऊर्जा और उत्साह के संवाहकजहाँ एक ओर वे प्रशासन, पर्यावरण और संस्कृति में अद्वितीय योगदान दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर खेलकूद के क्षेत्र में भी उनका योगदान अतुलनीय है।छत्तीसगढ़ कराटे फेडरेशन के प्रदेश अध्यक्ष रमाकांत एस. मिश्र बताते हैं कि सोनमणि बोरा ने कराटे जैसे अनुशासनिक खेल को प्रोत्साहित कर युवाओं को आत्मबल और अनुशासन का मार्ग दिखाया।उनका योगदान केवल यहीं तक सीमित नहीं रहा, पैरा एथलीट्स के लिए अवसरों का सृजन और छत्तीसगढ़ पैरालंपिक खेलों में विशेष रुचि लेकर उन्होंने समावेशी खेल संस्कृति की नींव रखी।फेंसिंग जैसे खेल, जो अब भी कई स्थानों पर उपेक्षित हैं, उन्हें आगे बढ़ाने में भी बोरा की प्रभावशाली भूमिका रही है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि खेल केवल प्रतिस्पर्धा नहीं, आत्म-विकास और सामाजिक समावेश का माध्यम हैं।सादा जीवन, निष्कलंक चरित्रआज भी सोनमणि बोरा उसी सादगी से जीवन जीते हैं, जो उनके व्यक्तित्व का सबसे प्रमुख आयाम है। धार्मिकता, पारिवारिक मूल्यों और नैतिक स्पष्टता से परिपूर्ण उनका जीवन आज के समय में एक प्रेरक आदर्श बन चुका है।एक दृष्टिकोण, जो समाज को दिशा देता है सोनमणि बोरा केवल एक अधिकारी नहीं, बल्कि एक दृष्टा हैं जो शासन को केवल प्रोटोकॉल की सीमा में नहीं रखते, बल्कि उसे जन-जुड़ाव की परंपरा बनाते हैं। उनकी कार्यशैली में माटी की सोंधी खुशबू, संस्कृति की आत्मीयता, और जनभावनाओं की आवाज़ है।उपसंहार: माटी से जुड़े मसीहासोनमणि बोरा एक ऐसा नाम, जो केवल प्रशासनिक कुशलता का प्रतीक नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की आत्मा को जीवंत करने वाले नेतृत्व का प्रतीक है।वे धरती से जुड़े हुए, संवेदनाओं में रचे-बसे, और विकास की राह पर समाज को साथ लेकर चलने वाले ऐसे सच्चे सेवक हैं, जो इस युग के लिए एक मिसाल बन चुके हैं।


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