तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ की मौजूदा राजनीति में एक गहरी बेचैनी साफ दिखाई दे रही है। सवाल यह है कि आखिर प्रदेश के मंत्री अपने ही विभागों में मनोनीत राजनीतिक नियुक्तियाँ कराने में इतने असहाय क्यों दिख रहे हैं। कई विभागों में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सलाहकार और अन्य पद महीनों से खाली पड़े हैं, जबकि मंत्रियों ने अपने-अपने विभागों से नामों का प्रस्ताव भी दे दिया है। इसके बावजूद फाइलें आगे नहीं बढ़ रही हैं, जिससे मंत्रियों को यह महसूस हो रहा है कि विभाग उनका होने के बावजूद निर्णय लेने की असली ताकत कहीं और केंद्रित हो गई है।राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा आम हो चुकी है कि एक मंत्री ने ही सारे निर्णयों को रोक कर बैठा है। कई राजनीतिक नियुक्तियाँ और विभागीय प्रस्ताव मुख्यमंत्री निवास सचिवालय में ही ठहर जाते हैं, जिससे मंत्रियों की भूमिका काफी सीमित हो गई है और वे खुलकर अपनी नाराजगी भी व्यक्त नहीं कर पा रहे। इससे विभागीय कामकाज प्रभावित हो रहा है और सरकार की कार्यशैली पर भी सवाल उठने लगे हैं।इस पूरी स्थिति के पीछे एक और बड़ी वजह चर्चा में है, एक प्रभावशाली विधायक, जो पहले एक IAS अधिकारी थे और अब सत्ता पक्ष में अपनी अलग ही पकड़ बनाए हुए हैं। माना जा रहा है कि यह विधायक मंत्रालय और सचिवालय के बीच एक अनौपचारिक शक्ति केंद्र की तरह कार्य कर रहे हैं। कई विभागीय फाइलें उनके संकेत के बिना आगे नहीं बढ़तीं, और मंत्रियों की ओर से की गई सिफारिशें भी इसी कारण लंबित पड़ी रहती हैं। चुने हुए मंत्री कमजोर और सिस्टम से आए विधायक अधिक शक्तिशाली नजर आ रहे हैं, यही बात सरकार के भीतर असहजता फैला रही है।मंत्रियों की तरह ही सत्ता पक्ष के कई विधायक भी संसदीय सचिवों की नियुक्ति को लेकर कुछ कहना चाहकर भी चुप हैं। वे जानते हैं कि यह नियुक्तियाँ सरकार को मजबूत करेंगी और संगठनात्मक संतुलन भी बनाएंगी, लेकिन मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से इस मुद्दे पर खुलकर बात करने का जोखिम कोई नहीं उठा पा रहा। कारण है संगठनात्मक अनुशासन का डर, नेतृत्व से टकराव की आशंका और राजनीतिक भविष्य पर संभावित असर। परिणाम यह हुआ है कि विधायक भी मौन हैं और राजनीतिक नियुक्तियों का मामला पूरी तरह ठप पड़ा हुआ है।इन सभी परिस्थितियों ने जनता और राजनीतिक विश्लेषकों के सामने यह संदेश साफ कर दिया है कि सरकार के भीतर समन्वय की कमी बढ़ रही है। शक्ति का केंद्रीकरण कुछ चुनिंदा हाथों में सिमटता जा रहा है, जिससे चुने हुए प्रतिनिधि अपनी भूमिका और सम्मान दोनों खोते दिख रहे हैं। राजनीतिक नियुक्तियों का अटकना, संसदीय सचिव की प्रक्रिया रुकना और विभागीय फाइलों में देरी यह संकेत है कि सरकार के भीतर हालात सामान्य नहीं हैं। सत्ता के भीतर एक “मौन का संकट” पैदा हो गया है, जो आने वाले समय में सरकार के लिए और गंभीर राजनीतिक चुनौतियाँ खड़ी कर सकता है।


