नूर मोहम्मद /गौरेला–पेंड्रा–मरवाही (सर्वव्यापी)
गौरेला विकासखंड के जोगीसार ग्राम के तरैयापारा में जच्चा–बच्चा की मौत ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। परिजनों ने आरोप लगाया है कि समय पर ऑपरेशन और उपचार न मिलने, तथा नर्स–डॉक्टर से लेकर अस्पताल प्रबंधन तक की घोर लापरवाही के कारण प्रसूता और नवजात की जान चली गई। सुबह 10 बजे अस्पताल पहुँची प्रसूता, शाम तक नहीं हुआ ऑपरेशन मृतिका अनिता बाई (30 वर्ष), पति शंकर यादव,चौथी बार गर्भवती थी। मितानिन की देखरेख में प्रसव पूर्व जांचें जारी थीं। प्रसव पीड़ा बढ़ने पर मितानिन की मदद से सुबह 10 बजे एंबुलेंस से जिला अस्पताल लाया गया।परिजनों का आरोप है कि सुबह से शाम तक न ऑपरेशन हुआ, न कोई निर्णायक उपचार मिला।
डॉक्टरों ने समय बर्बाद किया, सक्रियता नहीं दिखाई।
नर्सों ने दवाइयों और अन्य मदों के नाम पर रुपये भी मांगे,लेकिन फिर भी देखभाल नहीं हुई।शाम होते-होते प्रसूता की हालत गंभीर हो गई। तब जाकर उसे बिलासपुर स्थित सिम्स रेफर किया गया, लेकिन रास्ते में ही जच्चा और बच्चा दोनों की मौत हो गई। परिजनों का कहना है कि “यदि तुरंत रेफर कर दिया जाता या समय पर ऑपरेशन कर दिया जाता, तो अनिता और उसके बच्चे की जान बच सकती थी।”नर्सों पर भी सवाल “चार हजार रुपये देने पड़े, फिर भी इलाज नहीं मिला”मृतिका के पति शंकर यादव ने गंभीर आरोप लगाए हैं कि अस्पताल में प्रवेश के बाद नर्सों ने 4,000 रुपये तक वसूले,दवाओं और अन्य खर्चों के नाम पर अतिरिक्त राशि मांगी गई, इसके बावजूद देखभाल नहीं की गई, न ही डॉक्टरों को बार-बार बुलाने पर वे पहुँचे। गाँव की मितानिन क्रांति पैकरा ने भी अस्पताल की कार्यप्रणाली पर उंगली उठाई। उन्होंने कहा,“प्रसूता सुबह से भर्ती थी, पर पूरे दिन उचित निगरानी नहीं की गई। जिम्मेदार स्टाफ मौके पर मौजूद तो रहा, पर सक्रियता शून्य थी।” तीन दिन पहले भर्ती होने की थी सलाह—प्रबंधन ने जिम्मेदारी परिजनों पर डाली अस्पताल प्रबंधन ने अपनी सफाई देते हुए कहा कि प्रसूता को तीन दिन पहले ही भर्ती होने की सलाह दी गई थी, लेकिन परिजनों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया।
सीएमएचओ डॉ. रामेश्वर शर्मा ने दावा किया,“अस्पताल में पूरा प्रयास किया गया,पर हालत गंभीर होने पर रेफर करना पड़ा।”परिजन इस दावे को नकारते हुए कह रहे हैं कि यह लापरवाही छिपाने का प्रयास मात्र है।
मासूम बच्चों की रोती तस्वीर: बार-बार पूछते—माँ कब लौटेगी?
माँ की मौत के बाद तीन छोटे बच्चे बेसहारा हो गए हैं। परिजनों के अनुसार बच्चे अभी भी पूछ रहे हैं कि “माँ अस्पताल से कब आएगी?”उन्हें यह अहसास भी नहीं कि उनकी माँ कभी वापस नहीं लौटेगी। गाँव में इस घटना को लेकर गहरा आक्रोश है।
ग्रामीणों की मांग—नर्स, डॉक्टर और अस्पताल प्रशासन पर कार्रवाई हो।
गाँव वालों और परिजनों ने स्वास्थ्य विभाग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कीड्यूटी में लापरवाही, समय पर उपचार न देना,अनुचित धन वसूली, रेफरल में देरी,इन सबने मिलकर दो जिंदगियाँ छीन लीं।ग्रामीणों ने सरकार से माँग की है कि जिम्मेदार नर्सों, डॉक्टरों और अस्पताल प्रबंधन पर कड़ी कार्रवाई की जाए, जिससे ऐसी घटनाएँ दोबारा न हों।


