संपादक की कलम से…दिल्ली के नेता, बस्तर के दौरा… फेर कार्यकर्ता पूछत हें—हमर कसूर का हे?

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तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बार-बार छत्तीसगढ़, खासकर बस्तर अंचल मं आना अब एक नियमित राजनीतिक दृश्य बन गे हे। हर दौरा मं सरकारी कार्यक्रम, सुरक्षा समीक्षा, विकास योजना अऊ मंच ले बड़े-बड़े संदेश जरूर मिलथें। मुख्यमंत्री, संगठन के शीर्ष नेता अऊ अफसर मन संग बइठक हो जाथे, फोटो खिंचाथे अऊ दिल्ली तक खबर पहुंच जाथे। फेर इन सब के बीच छत्तीसगढ़ भाजपा के भीतर जो असंतोष सुलगत हे, ओकर जिक्र कहीं नई दिखत।छत्तीसगढ़ मं भाजपा सरकार बने अब पूरे दू साल हो गे हे। चुनाव मं पार्टी बर दिन-रात मेहनत करे वाले कार्यकर्ता, गली-गली घूमे विधायक अऊ संगठन के जमीनी सिपाही आज खुद ला ठगा-ठगा महसूस करत हें। वजह साफ हे—अब तक न तो संसदीय सचिव के नियुक्ति हो पाइस, न ही निगम-मंडल, आयोग, बोर्ड अऊ अलग-अलग राजनीतिक-संवैधानिक पद मं नियुक्ति हो पाइस। खाली कुर्सी मन आज भी फैसले के इंतजार मं खड़ी हें, अऊ कार्यकर्ता मन पूछत हें कि जब सरकार बन गे, त अधिकार अऊ जिम्मेदारी के बंटवारा काबर नई हो पावत हे?अमित शाह जी के हर दौरा मं नक्सलवाद, सुरक्षा, विकास अऊ प्रशासनिक एजेंडा प्रमुखता ले सामने आवत हे, फेर पार्टी संगठन के भीतर के नाराजगी, विधायक मन के असंतोष अऊ कार्यकर्ता मन के उपेक्षा पर कोई ठोस बात नई होवत। का ये मुद्दा अब सिर्फ अंदरूनी समझ के भरोसे छोड़ दे गे हे? का संगठन के पीड़ा सरकारी मंच ले बोलने लायक नई रहिगे?पार्टी के भीतर एक चर्चा जोर पकड़त हे कि भाजपा संगठन महामंत्री पवन साय सर्वेसर्वा के भूमिका मं हें। अगर संगठन के सूत्रधार वही हें, त सवाल सीधा अऊ तीखा हे—नियुक्ति प्रक्रिया मं ये चुप्पी काबर? का सब फैसला ऊपर ले आवे के इंतजार मं नीचे के संगठन ठहर गे हे? कार्यकर्ता मन मन-ही-मन कहत हें कि आदेश दिल्ली ले आवत हे, रायपुर मं चुप्पी छावत हे अऊ जिला मं सवाल पूछे वाला कोई नई बचत।राजनीति मं कई बेर जवाब ले जादा भारी चुप्पी होथे। आज छत्तीसगढ़ भाजपा मं वही चुप्पी सबसे तेज आवाज बन गे हे। जिन कार्यकर्ता मन पार्टी बर अपना समय, ऊर्जा अऊ सम्मान लगा दिस, ओमन आज खुद ला सिर्फ चुनावी मशीन समझे जात देखत हें। ये भावना अगर लंबा चले, त संगठन के जड़ कमजोर हो सकत हे।अमित शाह जी के दौरा अगर सिर्फ सरकारी कार्यक्रम तक सीमित रह जाही, त पार्टी संगठन के भीतर पनपत असंतोष अपने आप खत्म नई होही। संगठन के मजबूती बर जरूरी हे कि कार्यकर्ता के सम्मान, विधायक के भागीदारी अऊ संगठन के अपेक्षा ला भी उतने ही गंभीरता ले सुना जाए, जेतना सुरक्षा अऊ विकास के मुद्दा सुने जाथें।अब समय आ गे हे कि छत्तीसगढ़ भाजपा सरकार अऊ संगठन साफ-साफ बताय—नियुक्ति कब होही अऊ किस आधार मं होही। अगर जवाब नई मिलही, त कार्यकर्ता मन खुद निष्कर्ष निकालहीं कि उनकर भूमिका सिरिफ चुनाव तक सीमित रख दी गे हे। छत्तीसगढ़ मं भाजपा के जड़ मजबूत हें, फेर जड़ ला समय-समय मं पानी नई मिलही, त पेड़ सूखत बेर नई लगही। फैसला अब दिल्ली के दौरा मं नई, बल्कि रायपुर के राजनीतिक इच्छाशक्ति मं होही।


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