तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की सरकार को सत्ता संभाले दो वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन अब तक सरकार और संगठन से जुड़ी अहम राजनीतिक नियुक्तियाँ पूरी नहीं हो पाई हैं। संसदीय सचिवों की नियुक्ति, विभिन्न निगम–मंडल, आयोग, बोर्ड, सहकारी बैंकों तथा नगरीय निकायों में एल्डरमैन जैसे महत्वपूर्ण पद अब भी रिक्त पड़े हैं। इस लंबे इंतज़ार ने भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच गहरी नाराजगी और असंतोष को जन्म दे दिया है।संगठन से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि चुनाव के समय पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ काम करने वाले कार्यकर्ता आज खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। सत्ता में आने के बाद अपेक्षित जिम्मेदारियाँ न मिलने से न केवल उनका मनोबल टूट रहा है, बल्कि संगठनात्मक मजबूती भी प्रभावित हो रही है। यही कारण है कि पार्टी के भीतर ही भीतर रोष पनप रहा है, जो आने वाले समय में खुलकर सामने आ सकता है।विधायकों के बीच भी असंतोष के स्वर सुनाई देने लगे हैं। संसदीय सचिवों की नियुक्ति न होने से सरकार और विधानसभा के बीच समन्वय में अपेक्षित मजबूती नहीं आ पा रही है। वहीं निगम–मंडल और आयोगों के खाली पदों के चलते प्रशासनिक निर्णयों की गति भी धीमी पड़ती दिखाई दे रही है। सहकारी बैंकों और नगरीय निकायों में एल्डरमैन की नियुक्ति न होने से स्थानीय स्तर पर सरकार की पकड़ कमजोर हो रही है।राजनीतिक हलकों में अब निगाहें मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह पर टिकी हुई हैं। माना जा रहा है कि इस पूरे गतिरोध को तोड़ने में उनकी भूमिका निर्णायक हो सकती है। यदि नियुक्तियों की प्रक्रिया को जल्द गति नहीं दी गई और संगठन तथा सरकार के बीच संतुलन स्थापित नहीं हुआ, तो यह असंतोष सरकार के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।भाजपा के भीतर यह चर्चा अब आम हो चली है कि यदि समय रहते इन नियुक्तियों पर ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो इसका सीधा असर सरकार की छवि, संगठन की एकजुटता और आगामी राजनीतिक रणनीति पर पड़ेगा। सवाल यही है कि क्या सरकार अब भी स्थिति की गंभीरता को समझते हुए निर्णायक कदम उठाएगी, या फिर नियुक्तियों की यह देरी सरकार की नैया को संकट की ओर धकेल देगी?