कार्यालय की चारदीवारी से बाहर निकल कर बच्चों के अधिकारों की मशाल जला रहीं अध्यक्ष वर्णिका।

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तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ़ राज्य बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्ष वर्णिका शर्मा आज केवल एक पदनाम नहीं, बल्कि बाल अधिकारों की सशक्त पहचान बन चुकी हैं। वे उन चुनिंदा संवेदनशील नेतृत्वकर्ताओं में शामिल हैं, जिन्होंने कार्यालय की सीमाओं में सिमटकर काम करने के बजाय मैदानी स्तर पर उतरकर बच्चों के हक और सुरक्षा को प्राथमिकता दी है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ में बाल संरक्षण की चर्चा अब केवल राज्य तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसकी गूंज राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक सुनाई देने लगी है। बाल गृहों के निरीक्षण और पीड़ित बच्चों से सीधा संवाद, ये सभी पहलू यह दर्शाते हैं कि अध्यक्ष वर्णिका शर्मा बाल संरक्षण को कागजी कार्रवाई नहीं, बल्कि मानवीय जिम्मेदारी मानती हैं। उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि जब तक वास्तविक स्थिति को समझा नहीं जाएगा, तब तक नीतियां प्रभावी नहीं हो सकतीं।बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्ष वर्णिका शर्मा की कार्यशैली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे संवेदना और संवाद को प्राथमिकता देती हैं। बाल श्रम, बाल विवाह, यौन शोषण, शिक्षा से वंचित बच्चों और बाल गृहों में रह रहे बच्चों की स्थिति पर उन्होंने विशेष ध्यान दिया है। कई मामलों में उनकी तत्परता से न केवल पीड़ित बच्चों को न्याय मिला, बल्कि व्यवस्था में सुधार भी देखने को मिला।पहले जहां आयोग को केवल एक औपचारिक संस्था के रूप में देखा जाता था, वहीं अब यह कार्रवाई और हस्तक्षेप करने वाला सशक्त मंच बन चुका है। जिलों में जाकर प्रशासन, पुलिस, शिक्षा और महिला-बाल विकास विभाग के साथ समन्वय स्थापित करना—यह सब अध्यक्ष वर्णिका शर्मा की सक्रिय नेतृत्व क्षमता को दर्शाता है।बाल संरक्षण के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ में हो रहे नवाचार और जागरूकता अभियानों की जानकारी विभिन्न मंचों के माध्यम से देश-विदेश तक पहुंच रही है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि छत्तीसगढ़ राज्य बाल संरक्षण आयोग अब एक मॉडल के रूप में उभर रहा है, जिसकी नींव में अध्यक्ष वर्णिका शर्मा का समर्पण और दृष्टिकोण शामिल है।कुल मिलाकर, वर्णिका शर्मा का नेतृत्व यह संदेश देता है कि बाल संरक्षण केवल कानून का विषय नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। कार्यालय से बाहर निकलकर बच्चों के बीच पहुंचना, उनकी पीड़ा को समझना और त्वरित समाधान देना—यही वह कार्यशैली है, जो छत्तीसगढ़ को बाल अधिकारों के क्षेत्र में नई पहचान दिला रही है।


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