आईएएस–आईपीएस से भरा सचिवालय, फिर भी जनता बेबस: मुख्यमंत्री कार्यालय में जनशिकायतें बनकर रह गईं फाइलों का बोझ।

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तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के सचिवालय में देश की सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की मजबूत टीम पदस्थ है। प्रमुख सचिव, सचिव और संयुक्त सचिव जैसे महत्वपूर्ण पदों पर अनुभवी और शक्तिशाली अफसर तैनात हैं, लेकिन इसके बावजूद आम जनता की समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। यह स्थिति प्रशासनिक व्यवस्था और सुशासन के दावों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर रही है।सूत्रों और पीड़ित नागरिकों का कहना है कि मुख्यमंत्री सचिवालय को भेजी जाने वाली जन शिकायतों को औपचारिक रूप से स्वीकार तो किया जाता है, लेकिन उनका निस्तारण केवल कागजी प्रक्रिया बनकर रह जाता है। अधिकांश मामलों में बिना किसी ठोस समीक्षा के शिकायत पत्र संबंधित विभागों को अग्रेषित कर दिए जाते हैं, जिसके बाद फाइलें विभागीय दफ्तरों में वर्षों तक लंबित पड़ी रहती हैं।सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि संबंधित विभागों द्वारा न तो समयबद्ध जांच की जाती है और न ही शिकायतकर्ताओं को किसी प्रकार की ठोस कार्रवाई या प्रगति की जानकारी दी जाती है। महीनों तक जवाब की प्रतीक्षा कर रहे नागरिक अंततः निराश होकर चुप बैठने को मजबूर हो जाते हैं। इससे सरकार की जनहितैषी छवि और “सुशासन” के दावों की पोल खुलती नजर आ रही है।प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि सचिवालय स्तर पर प्रभावी मॉनिटरिंग और फॉलोअप सिस्टम के अभाव में विभागीय अधिकारी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लेते। यदि सचिवालय से भेजी गई शिकायतों की नियमित समीक्षा, समय-सीमा और जवाबदेही तय की जाए, तो हालात में उल्लेखनीय सुधार संभव है। लेकिन वर्तमान व्यवस्था में जवाबदेही तय न होने से जनता की आवाज़ दबती जा रही है।ऐसे में मुख्यमंत्री सचिवालय के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह और सचिव पी. दयानंद की भूमिका बेहद अहम हो जाती है। जनता की अपेक्षा है कि ये वरिष्ठ अधिकारी केवल फाइलें आगे बढ़ाने की औपचारिकता तक सीमित न रहें, बल्कि शिकायतों के वास्तविक समाधान के लिए सख्त निर्देश, प्रभावी निगरानी तंत्र और जवाबदेही सुनिश्चित करें।अब बड़ा सवाल यह है कि क्या मुख्यमंत्री सचिवालय इस बढ़ते जन असंतोष को गंभीरता से लेते हुए व्यवस्था में ठोस सुधार करेगा, या फिर आम जनता की चिट्ठियाँ यूं ही दफ्तरों की अलमारियों में दबी रह जाएंगी। आम नागरिक आज भी इस उम्मीद में है कि उसकी आवाज़ सत्ता के गलियारों तक सिर्फ पहुंचे ही नहीं, बल्कि उसका असर भी साफ दिखाई दे।


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