तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाने वाली पत्रकारिता इन दिनों अपने मूल उद्देश्य से भटकती दिखाई दे रही है। हाल ही में सामने आए एक पत्र के हवाले से यह गंभीर सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या सूचना के अधिकार जैसे पारदर्शिता के औजार का उपयोग अब जनहित की जगह व्यक्तिगत एजेंडा और सनसनी फैलाने के लिए किया जाने लगा है।पत्र में उल्लेख है कि बड़ी संख्या में बिलासपुर जिले के शिक्षा विभाग से जुड़े कर्मचारियों और शिक्षकों के विरुद्ध लगातार सूचना के अधिकार के आवेदन लगाए जा रहे हैं। इन आवेदनों के माध्यम से सेवा संबंधी और व्यक्तिगत जानकारियां जुटाकर बिना समुचित जांच-पड़ताल के सार्वजनिक की जा रही हैं। इससे न केवल संबंधित कर्मचारियों की छवि प्रभावित हो रही है, बल्कि समाज में उनके प्रति अविश्वास का वातावरण भी बन रहा है।सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि तथ्यों की पुष्टि किए बिना, किसी भी पक्ष को सुने बिना और जनहित की कसौटी पर परखे बिना खबरें परोसी जा रही हैं। पत्रकारिता, जो कभी सत्य, संतुलन और संवेदनशीलता की पहचान थी, अब कई मामलों में मीडिया ट्रायल और छवि धूमिल करने का माध्यम बनती प्रतीत हो रही है।पत्र में यह भी कहा गया है कि आरटीआई का उद्देश्य भ्रष्टाचार उजागर करना और व्यवस्था में पारदर्शिता लाना है, न कि कर्मचारियों पर मानसिक दबाव बनाना या उन्हें सार्वजनिक रूप से कटघरे में खड़ा करना। जब सूचना के अधिकार का इस्तेमाल डर और दबाव के औजार के रूप में होने लगे, तो यह कानून और पत्रकारिता दोनों की भावना के खिलाफ है।बुद्धिजीवियों और जागरूक नागरिकों का मानना है कि पत्रकारिता का स्तर गिरना केवल किसी एक वर्ग की समस्या नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। आवश्यकता इस बात की है कि पत्रकारिता फिर से अपने मूल मूल्यों सत्य, निष्पक्षता और जिम्मेदारी की ओर लौटे, ताकि समाज का भरोसा कायम रह सके।आज जब खबरों की होड़ में संवेदनशीलता और नैतिकता पीछे छूटती जा रही है, तब यह आत्ममंथन जरूरी हो गया है कि क्या हम सच में पत्रकारिता कर रहे हैं या केवल खबरों के नाम पर आरोपों का बाजार सजा रहे हैं।