तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष धरम लाल कौशिक के विधानसभा क्षेत्र और केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू के संसदीय क्षेत्र बिलासपुर जिले के बिल्हा विकास खंड में शिक्षा विभाग से जुड़ा करीब 30 लाख रुपये का फर्जी मेडिकल भुगतान घोटाला सामने आने से प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा हुआ है। यह मामला केवल एक-दो व्यक्तियों तक सीमित नहीं दिख रहा, बल्कि बिल्हा खंड शिक्षा विभाग से लेकर जिला शिक्षा विभाग तक की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।सूत्रों के अनुसार, मेडिकल भुगतान के नाम पर किए गए इस कथित घोटाले में एक शिक्षक नेता की भूमिका पर सवाल उठे हैं, लेकिन जांच की दिशा जिस तरह से मोड़ी जा रही है, उससे संकेत मिलते हैं कि कई जिम्मेदार अफसरों को बचाने और कुछ को फंसाने की तैयारी चल रही है। यही वजह बताई जा रही है कि संबंधित शिक्षकों के मेडिकल भुगतान से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज रहस्यमय तरीके से गायब करा दिए गए हैं।सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि दस्तावेजों के गायब होने के बावजूद अब तक निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच शुरू नहीं हो सकी है। आरोप है कि खंड स्तर पर जिम्मेदार अधिकारियों ने समय रहते रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के बजाय उसे ओझल करने में भूमिका निभाई, जबकि जिला स्तर पर निगरानी और नियंत्रण की जिम्मेदारी निभाने वाले अफसरों की चुप्पी संदेह को और गहरा कर रही है।यह मामला केवल वित्तीय अनियमितता का नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही, पारदर्शिता और राजनीतिक संवेदनशीलता से जुड़ा है। जिस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व प्रदेश और केंद्र की राजनीति के बड़े नाम करते रहे हों, वहां शिक्षा विभाग में इस स्तर की कथित गड़बड़ी पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करती है।अब सवाल यह है कि दस्तावेज किसके निर्देश पर गायब हुए?भुगतान की स्वीकृति किन स्तरों पर मिली?जिला शिक्षा विभाग की भूमिका जांच से क्यों बच रही है?जब तक स्वतंत्र एजेंसी से निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं होती, तब तक यह मामला दबाने की कोशिशों और विभागीय मिलीभगत की जीती-जागती मिसाल बना रहेगा। शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में हुए इस कथित घोटाले पर जवाबदेही तय करना अब प्रशासन की परीक्षा है।