कबीरधाम/ चेतन साहू/ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग में शीघ्र होने वाली नियुक्तियों को लेकर राजनीतिक और साहित्यिक गलियारों में जबरदस्त सुगबुगाहट तेज हो गई है। आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों के चयन से पहले ही दावेदारों की लंबी कतार लग चुकी है, जिसमें जहां एक ओर वरिष्ठ और उम्रदराज साहित्यकार अपने अनुभव के आधार पर मजबूत दावा ठोक रहे हैं, वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के नाम भी चर्चा में हैं।इसी बीच यह मुद्दा अब केवल योग्यता और अनुभव तक सीमित न रहकर जातिगत और राजनीतिक समीकरणों में उलझता नजर आ रहा है। विभागीय सूत्रों का कहना है कि कुछ विशेष जाति वर्ग के उम्रदराज साहित्यकारों को आगे बढ़ाने की तैयारी चल रही है, जिस पर अंदरखाने तीखी असहमति उभरकर सामने आई है।सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू और उप मुख्यमंत्री अरुण साव अपने-अपने स्तर पर आयोग की कमान अपने ही स्वजाति बंधु को सौंपे जाने पर जोर दे चुके हैं। इस राजनीतिक दबाव ने चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।वहीं दूसरी ओर युवा साहित्यकारों और भाषा कर्मियों में जबरदस्त नाराजगी देखी जा रही है। उनका कहना है कि राजभाषा जैसे संवेदनशील और सृजनात्मक क्षेत्र में वर्षों से जमी उम्रदराज लॉबी के बजाय अब नई सोच, आधुनिक दृष्टिकोण और सक्रिय युवाओं को अवसर दिया जाना चाहिए। युवा वर्ग इसे केवल नियुक्ति नहीं, बल्कि हिंदी और छत्तीसगढ़ी भाषा के भविष्य से जुड़ा सवाल बता रहा है।कुल मिलाकर, राजभाषा आयोग की संभावित नियुक्ति अब एक साधारण प्रशासनिक प्रक्रिया न रहकर राजनीतिक दबाव, जातीय संतुलन और पीढ़ीगत टकराव का केंद्र बनती जा रही है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार अनुभव के नाम पर पुराने चेहरों को तरजीह देती है या फिर युवाओं की बढ़ती मांग को स्वीकार कर कोई चौंकाने वाला फैसला लेती है।