तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/

बिलासपुर जिले में स्कूलों में अध्यापन व्यवस्था सुधारने के नाम पर जिला शिक्षा अधिकारी विजय टोंडे द्वारा संलग्न शिक्षकों को हटाने की प्रक्रिया तेज की गई है। कागजों में यह कदम शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने वाला बताया जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही सवाल खड़े कर रही है।सूत्रों के अनुसार, कई ऐसे शिक्षक जो वर्षों से सरकारी दफ्तरों में बाबूगिरी कर रहे हैं या खुद को अधिकारी की तरह स्थापित कर कार्यालयीन कामकाज संभाल रहे हैं, उनके खिलाफ अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। ये शिक्षक न तो नियमित रूप से विद्यालयों में अध्यापन करते हैं और न ही छात्रों से उनका सीधा सरोकार है, इसके बावजूद वे सुरक्षित बने हुए हैं।हैरानी की बात यह है कि जिन शिक्षकों को अस्थायी रूप से किसी कार्य के लिए संलग्न किया गया था और जो कभी-कभार स्कूल व्यवस्था से जुड़े रहे, उन्हें तो तुरंत हटाया जा रहा है, लेकिन वर्षों से शिक्षा विभाग के कार्यालयों में जमे “फाइल मास्टर” शिक्षकों पर कार्रवाई करने से विभाग परहेज करता नजर आ रहा है। इससे यह संदेश जा रहा है कि कार्रवाई समान नहीं, बल्कि चयनात्मक है।शिक्षक संगठनों और शिक्षा से जुड़े जानकारों का कहना है कि यदि वास्तव में स्कूलों में अध्यापन सुधारना उद्देश्य है, तो सबसे पहले उन शिक्षकों को वापस कक्षाओं में भेजा जाना चाहिए जो दफ्तरों में बैठकर प्रशासनिक काम कर रहे हैं। यही शिक्षक यदि स्कूल लौटें, तो कई विद्यालयों में शिक्षकों की कमी स्वतः पूरी हो सकती है।अब सवाल यह उठता है कि क्या जिला शिक्षा अधिकारी विजय टोंडे दबाव, सिफारिश या अंदरूनी संरक्षण के चलते दफ्तरों में जमे शिक्षकों पर कार्रवाई नहीं कर पा रहे हैं, या फिर जानबूझकर इस मुद्दे से आंखें मूंदे हुए हैं? शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और न्याय तभी संभव है, जब कार्रवाई सभी पर समान रूप से हो,चाहे वह स्कूल में हो या सरकारी दफ्तर की कुर्सी पर जमे “शिक्षक बाबू” ही क्यों न हों।