संपादक के कलम से…ऊँचाई के घमंड के बाद, धरती पर लौटने की सच्चाई।

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तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/

मनखे जन्म लेथे, सामान्य होथे। बचपन म सीखथे, जवानी म संघर्ष करथे, अउ समाज म अपन जगह बनाथे।जिंदगी के सफर म कुछ मनखे मुख्यमंत्री, विधायक, सांसद, आईएएस, आईपीएस, आईएफएस या बड़े प्रशासनिक पद म पहुँच जाथें। पद अउ शक्ति देखके मनखे अकसर अपने आप ला भूल जाथे। अहंकार आसमान छू लेथे। लोगन के नमन, तारीफ या डर देखके ओला लगता हे कि अब ऊँचाई हमेशा बनी रहिही।लेकिन समय के पहिया कभू नई रुकथे। कुछ साल के बाद पद खतम हो जाथे, राजनीतिक अधिकार खत्म हो जाथे, जिम्मेदारी मिट जाथे। तब समाज पूछथे केवल इंसान के चरित्र और व्यवहार के बारे म—ना पद, ना शक्ति, ना नाम।यही समय आय जब ऊँचाई के घमंड झड़थे और असली सच सामने आवथे। इंसान के असली पहचान ओ समय म दिखथे जब ओ अपन पद खो देथे। समाज देखथे कि इंसान दूसर के संग कैसे व्यवहार करिस, दूसर के मदद करे या नई, अपन शक्ति का उपयोग सही दिशा म करे या केवल अहंकार खातिर।असली महानता पद या दिखावे म नई, बल्कि व्यवहार, संवेदनशीलता और दूसर के प्रति सम्मान म होथे। घमंड जइसने ऊँचा होथे, धरती पर लौटना ओतके कड़वा और जरूरी होथे।हर मनखे ला ये समझना जरूरी हे—पद अस्थायी आय, लेकिन व्यवहार और असली पहचान हमेशा रहिथे। समाज कभू नई भुलाथे, ओमन हमेशा इंसान के चरित्र अउ असली आत्मा ला आंकथें।अंततः इंसान के असली गौरव ओकर पद म नई, ओकर विनम्रता, संवेदनशीलता और दूसर के प्रति सम्मान म होथे। यही असली पहचान हे, जऊन जीवन भर संग रहिथे।


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