वन घोटाले की परतें खोलने पर बौखलाया तंत्र! संपादक तरुण कौशिक को धमकियां , पत्रकारिता पर हमला या भ्रष्टाचार का डर ?

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विकास नंद (सर्वव्यापी)

वन विभाग से जुड़े कथित घोटालों की परतें जैसे-जैसे सामने आने लगी हैं, वैसे-वैसे तंत्र की बेचैनी भी खुलकर उजागर हो रही है। भ्रष्टाचार के दस्तावेज़ी सबूत सामने लाने वाले वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक तरुण कौशिक को मिल रही धमकियां इसी बौखलाहट का संकेत मानी जा रही हैं। सवाल यह है कि क्या यह पत्रकारिता पर सीधा हमला है, या फिर उन चेहरों का डर जो सच के उजाले में बेनकाब होने से घबरा रहे हैं? लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को दबाने की यह कोशिश न केवल चिंताजनक है, बल्कि पूरे तंत्र की नीयत पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करती है।वन विभाग में कथित घोटालों पर लगातार, बेबाक और तथ्यपरक समाचार प्रकाशित करने से वन महकमे में हड़कंप मचा हुआ है। सर्वव्यापी के संपादक तरुण कौशिक द्वारा लगातार वन विभाग से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर किए जाने के बाद अब मामला गंभीर मोड़ पर पहुंचता नजर आ रहा है। सूत्रों के अनुसार कोरबा, कोरिया और रायपुर में यह चर्चा जोरों पर है कि वन विभाग से जुड़ी खबरें प्रकाशित करने पर सर्वव्यापी के प्रधान संपादक तरुण कौशिक को जान से मारने की धमकी देने और झूठे मामलों में फंसाने की साजिश रची जा रही है।विश्वसनीय सूत्र बताते हैं कि घोटालों के उजागर होने से कुछ वन विभाग के वरिष्ठ अफसरों में बेचैनी इस कदर बढ़ गई है कि अब वे कानूनी जवाबदेही से बचने के बजाय पत्रकारों को डराने-धमकाने की राह पर उतर आए हैं। यह घटनाक्रम न केवल प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि जिन सवालों के जवाब देने चाहिए थे, उनसे बचने के लिए दबाव की राजनीति अपनाई जा रही है।राजधानी रायपुर के वरिष्ठ पत्रकारों और पत्रकार संगठनों ने इस पूरे घटनाक्रम पर कड़ा रुख अपनाया है। पत्रकारों का कहना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘सर्वव्यापी’ की मुहिम में पूरा पत्रकार संगठन मजबूती से साथ खड़ा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी पत्रकार को धमकाकर सच्चाई की आवाज को दबाया नहीं जा सकता।पत्रकार संगठनों ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि सर्वव्यापी के प्रधान संपादक तरुण कौशिक या किसी भी पत्रकार को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया गया, तो इसे लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला माना जाएगा और प्रदेशव्यापी आंदोलन से जवाब दिया जाएगा।अब सवाल यह है किक्या वन विभाग अपने ऊपर लगे आरोपों की निष्पक्ष जांच कराएगा?या फिर सच लिखने वालों को डराकर चुप कराने की कोशिश करेगा?जनता और पत्रकारिता दोनों की नजरें अब प्रशासन और सरकार की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।क्योंकि सवाल सिर्फ एक संपादक की सुरक्षा का नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा का है।वहीं सर्वव्यापी के प्रधान संपादक तरुण कौशिक ने कहा कि वह न केवल वन विभाग बल्कि तमाम विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ बेबाकी से समाचार प्रकाशित करते रहेंगे, जिसे जो करना है,वह स्वतंत्र है,हम किसी तरह के धमाकियों से नहीं डरेंगे और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करते हुए अपनी कलम चलाते रहेंगे।


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