के.एस.ठाकुर/कार्यकारी संपादक, सर्वव्यापी

संयुक्त संचालक, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण बिलासपुर के तत्कालीन संयुक्त संचालक द्वारा संभाग के विभिन्न सामुदायिक एवं प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में आवश्यकता पड़ने पर समय-समय पर स्वास्थ्य कर्मचारियों का संलग्निकरण किया गया था, ताकि ग्रामीण व दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित न हों।हालांकि वर्तमान संयुक्त संचालक द्वारा सामान्य प्रशासन विभाग के आदेशों का हवाला देते हुए पूर्व में लगभग 47 स्वास्थ्य कर्मचारियों का संलग्निकरण समाप्त कर दिया गया है। समस्या यह है कि इन स्थानों पर अब तक राज्य शासन द्वारा नियमित पदस्थापना नहीं की गई, जिससे कई स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर, नर्स, लैब टेक्नीशियन और अन्य आवश्यक स्टाफ की भारी कमी हो गई है।कर्मचारियों के अभाव में मरीजों को इलाज, जांच और प्राथमिक उपचार के लिए गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। कई केंद्रों में ओपीडी सेवाएं सीमित हो गई हैं, तो कहीं प्रसव और आपातकालीन सेवाएं तक प्रभावित हो रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले मरीजों को मजबूरन जिला अस्पताल या निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है।इसी बीच विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि जिन स्थानों पर संलग्निकरण समाप्त किए गए हैं, वहां मोटी रकम लेकर नए संलग्निकरण किए जाने की संभावना जताई जा रही है। यदि ऐसा होता है तो यह पूरे मामले को संदेह के घेरे में ला देता है और स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।सूत्रों का यह भी कहना है कि वर्तमान संयुक्त संचालक को चाहिए था कि वे इन पदों पर नियमित कर्मचारियों की पदस्थापना होने तक संलग्निकरण समाप्त करने के निर्णय पर पुनर्विचार करते या कम से कम स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ एवं जिम्मेदार अधिकारियों से मार्गदर्शन लेते। जल्दबाजी में लिया गया यह निर्णय सीधे-सीधे आम मरीजों पर भारी पड़ता दिख रहा है।अब देखना यह होगा कि स्वास्थ्य विभाग इस स्थिति को गंभीरता से लेते हुए कब तक रिक्त पदों पर नियमित पदस्थापना करता है, या फिर संलग्निकरण के नाम पर किसी नए विवाद को जन्म देता है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि स्वास्थ्य सेवाओं की इस अव्यवस्था की जिम्मेदारी कौन लेगा?