मोदी राज में महंगाई, भाजपाई खामोश क्यों..?

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

देश में बढ़ती महंगाई को लेकर केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक नीतियां एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र में आ गई हैं। एक समय महंगाई को सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाकर तत्कालीन सरकारों को घेरने वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार आज स्वयं महंगाई के सवालों से जूझती नजर आ रही है। विपक्षी दलों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों के एक वर्ग का कहना है कि महंगाई पर नियंत्रण के वादों के बावजूद आम जनता को अपेक्षित राहत नहीं मिल सकी है। देश में रसोई गैस, खाद्य तेल, दाल, सब्जियां, दूध, पेट्रोल-डीजल, शिक्षा, स्वास्थ्य और दैनिक उपयोग की अनेक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों ने गरीब, मध्यम वर्ग और मजदूर परिवारों के घरेलू बजट पर गहरा असर डाला है।देश के विभिन्न हिस्सों से लगातार यह आवाज उठ रही है कि आम आदमी की आय की तुलना में खर्च कहीं अधिक तेजी से बढ़ा है। परिवारों को अपने मासिक बजट में कटौती करनी पड़ रही है, बचत कम हो रही है और कई आवश्यक खर्चों को टालने की स्थिति पैदा हो रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों पर खेती की बढ़ती लागत का दबाव है, वहीं शहरी क्षेत्रों में नौकरीपेशा और मध्यम वर्गीय परिवार बढ़ते खर्चों के कारण आर्थिक तनाव का सामना कर रहे हैं। बढ़ती महंगाई का असर केवल रसोई तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन और रोजमर्रा के जीवन के लगभग हर क्षेत्र पर दिखाई दे रहा है।विपक्षी दल लगातार केंद्र सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि महंगाई को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए हैं। विपक्ष का कहना है कि चुनावी सभाओं और राजनीतिक मंचों से जनता को महंगाई से राहत देने के जो वादे किए गए थे, वे आज भी आम नागरिकों के लिए अधूरे दिखाई दे रहे हैं। कई राजनीतिक दलों ने बढ़ती कीमतों को लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ आंदोलन और प्रदर्शन भी किए हैं तथा संसद से लेकर सड़कों तक इस मुद्दे को उठाया है।हालांकि, केंद्र सरकार का पक्ष है कि महंगाई केवल भारत की समस्या नहीं है, बल्कि यह एक वैश्विक चुनौती है। सरकार का कहना है कि कोविड-19 महामारी के बाद की आर्थिक परिस्थितियां, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आई बाधाएं और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों ने महंगाई पर प्रभाव डाला है। सरकार का यह भी दावा है कि आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता बनाए रखने और आर्थिक विकास को गति देने के लिए लगातार नीतिगत कदम उठाए जा रहे हैं।आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि महंगाई का सबसे अधिक प्रभाव निम्न और मध्यम आय वर्ग पर पड़ता है, क्योंकि उनकी आय सीमित होती है और खर्च का बड़ा हिस्सा आवश्यक वस्तुओं पर ही खर्च होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि महंगाई लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती है, तो इसका असर उपभोग, बचत और आर्थिक विकास की गति पर भी पड़ सकता है।देश में अब यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या महंगाई पर नियंत्रण का मुद्दा आने वाले समय में केंद्र सरकार के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बन सकता है। आम जनता के बीच यह चर्चा है कि विकास, बुनियादी ढांचे और आर्थिक उपलब्धियों के बड़े दावों के साथ-साथ दैनिक जीवन की समस्याओं और बढ़ती कीमतों पर भी समान गंभीरता से ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। महंगाई का मुद्दा केवल आर्थिक आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह करोड़ों परिवारों की रोजमर्रा की जिंदगी, उनकी आर्थिक सुरक्षा और भविष्य की उम्मीदों से जुड़ा हुआ विषय बन चुका है। ऐसे में यह स्पष्ट है कि महंगाई पर होने वाली राजनीतिक और सामाजिक बहस आने वाले समय में और अधिक तेज हो सकती है।


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