तरुण कौशिक, संपादक, सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ की राजधानी में यातायात सुधार, अवैध पार्किंग हटाने और सड़कें खाली कराने के दावे अक्सर किए जाते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे ठीक उलट तस्वीर पेश करती है। शहर के सबसे वीआईपी और प्राइम इलाके सिविल लाइन में दो ऐसी अवैध पार्किंग व्यवस्थाएं वर्षों से चल रही हैं, जिनके कारण सार्वजनिक सड़कें धीरे-धीरे निजी उपयोग की वस्तु बन चुकी हैं और प्रशासन मौन दर्शक बना हुआ है।पहला मामला राज्यपाल निवास के सामने का है, जिसे अब अलग-अलग नामों से संबोधित किया जाता है। यहां आधी सड़क पर लंबे समय से अवैध पार्किंग संचालित है। स्थिति यह है कि सड़क के दोनों सिरों पर गेट लगाकर आम नागरिकों का आवागमन तक नियंत्रित कर दिया गया है। सवाल उठता है कि क्या यह सड़क किसी निजी या विशिष्ट उपयोग के लिए बनाई गई थी, या फिर यह भी बाकी सड़कों की तरह सार्वजनिक आवागमन के लिए ही निर्मित की गई थी। यदि यह सार्वजनिक सड़क है, तो इसे वर्षों से बंद कर पार्किंग में बदलने की अनुमति किसने और किस आदेश से दी।दूसरा मामला इससे भी अधिक गंभीर है। मुख्यमंत्री के पुराने निवास, यानी गांधी उद्यान के पास स्थित बंगले के चारों ओर सुरक्षा के नाम पर तीन तरफ से पूरी सड़क को घेर लिया गया है। नतीजतन, पूरी सड़क एक तरह से स्थायी अवैध पार्किंग में तब्दील हो चुकी है। आम लोगों के लिए यह रास्ता अब वैकल्पिक मार्ग खोजने की मजबूरी बन चुका है, जबकि वीआईपी सुविधाएं बिना किसी औपचारिक अधिसूचना के लगातार जारी हैं।सबसे अहम सवाल यह है कि जब मुख्यमंत्री और मंत्रियों के लिए नवा रायपुर में करोड़ों रुपये की लागत से नए और अत्याधुनिक आवास बन चुके हैं, तब सिविल लाइन के इन बंगलों के आसपास सड़कों पर कब्जा बनाए रखने का औचित्य क्या है। जानकारों का मानना है कि इन बंगलों को पासपोर्ट कार्यालय या अन्य बड़े शासकीय कार्यालयों को सौंपा जा सकता है, जो वर्तमान में निजी भवनों में लाखों रुपये मासिक किराए पर संचालित हो रहे हैं। इससे न केवल सरकारी धन की बचत होगी, बल्कि सिविल लाइन क्षेत्र की यातायात व्यवस्था भी सुधर सकती है।कानूनी दृष्टि से भी यह मामला कई सवाल खड़े करता है। क्या नगरीय निकाय विभाग द्वारा इन सड़कों का भू-प्रयोजन सार्वजनिक सड़क से बदलकर निजी पार्किंग या विशेष उपयोग के लिए घोषित किया गया है। यदि ऐसा कोई आदेश मौजूद नहीं है, तो फिर यह स्पष्ट रूप से सार्वजनिक संपत्ति पर अवैध कब्जे का मामला बनता है, वह भी राजधानी के सबसे महंगे और संवेदनशील इलाके में।आज स्थिति यह है कि आम नागरिक को थोड़ी देर के लिए सड़क किनारे वाहन खड़ा करने पर चालान और टोइंग का सामना करना पड़ता है, जबकि दूसरी ओर वर्षों से पूरी-की-पूरी सड़कें बंद कर अवैध पार्किंग चलाई जा रही हैं। इससे यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या कानून सबके लिए समान है या फिर नियम केवल आम जनता पर ही लागू होते हैं।राजधानी की ये सड़कें किसी व्यक्ति विशेष या किसी एक विभाग की सुविधा के लिए नहीं, बल्कि जनता के सुरक्षित और सुगम आवागमन के लिए बनाई गई थीं। अब समय आ गया है कि राज्यपाल निवास और मुख्यमंत्री के पुराने निवास के आसपास बनी इन दोनों अवैध पार्किंग व्यवस्थाओं को तत्काल हटाया जाए, गेट और घेराबंदी समाप्त हो, और सिविल लाइन की सड़कें फिर से जनता को लौटाई जाएं,क्योंकि राजधानी की सड़कें निजी सुविधा नहीं, सार्वजनिक अधिकार है ।